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Wednesday, May 18, 2016

जात ना पूछो साधू की....!!

खाना खाया है?
“नहीं, यहाँ खाना में लहसुन-प्याज़ डालते हैं. हम लहसुन-प्याज़ नहीं खाते”
क्यों नहीं खाते?
“मैथिलि हैं. जानते हैं. पंडित, भरद्वाज गोत्र...मुग़लसराय के” कहकर गले में पहना सूत का जनेऊनुमा धागा दिखाती है. मुझे बजरंगी भाईजान फिल्म का डायलोग याद आता है...”गोरा रंग है, जरुर बामन होगी”.
पैसे हैं..कितने हैं...?
वो लाल रंग का एक छोटा सा झोला खोलती है. झोले में एक ‘पन्नी’ है, छोटा सा पॉलीथीन. और कुछ नहीं. वह बिना किसी झिझक के पन्नी बाहर निकालती है. पन्नी में से कुछ चिल्लर झांकती है..एक और दो रूपये के सिक्के...बामुश्किल आठ-दस रुपये होंगे...!!
बस.
बातचीत की तो उसे लगा कि बाबू ने सहानुभूति दिखाई है. मेरी मनोदशा समझ कर हाथ फैला देती है. मैंने और बात करना चाहता हूँ. चमचमाते मल्टी नेशनल ब्रांड्स के शोरूम के ठीक सामने लगे बेंच पर मेरे बराबर में बैठने कि वह हिम्मत नहीं कर पाती. नीचे गर्म ज़मीन पर बैठने लगती है तो मेरी नज़र उसके पैरों की ओर पड़ती है. पुरानी घिस चुकी रबड़ की कैंची चप्पलें और बीमारी से सूज चुका दायाँ पैर.
मैं उसे अपने बराबर में बैठने को कहता हूँ. अजनबी शहर में कोई इतना पूछ ले कि खाना खाया है माता जी..? तो बमुश्किल रोके हुए बेबसी और लाचारी के आंसू बगावत कर देते है. घोर गरीबी के बावजूद सत्तर साल की उम्र में भी उषा देवी के चेहरे पर सत्व झलकता है, ये सिर्फ सात्विकता से आ सकता है. गरीबी चेहरे पर झुर्रियां डाल सकती है, मन और आत्मा पर नहीं.
“सुबह से तुमने ही बाबू अच्छे से बात की है. नहीं तो दूर से पंजे (हाथ) के इशारे से ही भगा देते हैं.”
अच्छा अब बताओ खाना क्यों नहीं खाया.
“पैसा नहीं है. कल रात में खाया था दिल्ली स्टेशन पर एक पूड़ी और भाजी. एक जन बाँट रहा था. बिना टिकट ही गाड़ी (ट्रेन) में बैठकर आ गयी.”
मतलब जब घर से चली थी तो भी पैसा नहीं था?
“पैसा कहाँ से आता. पति का एक हाथ और पैर कमजोर (अधरंग) हो गया है. लोगों के घर में काम करती हूँ तो दो जन का खाना दे देते हैं. ये धोती (साड़ी) दीवाली पर दिया था.”
और बच्चे? वो मदद नहीं करते?
“बच्चे नहीं रहे. चार थे ख़तम हो गए. बड़ा 12 साल बीमार रहा फिर नहीं रहा. उस से छोटा था. एक दिन बुखार आया और रात को ही ख़त्म. एक बेटी को मुंह से झाग आता था, और सबसे छोटी को माता आई और साथ ही ले गयी.”
कोई ज़मीन नहीं है.  
“थी...दो बीघा. मुग़लसराय स्टेशन से एक कोस दूर ही गाँव है. वही थी. बेटे के इलाज़ के लिए बेच दी. सोचा बच्चा रहेगा तो ज़मीन के बिना भी गुजरा कर लेंगे. अभी दस साल हो गए हैं लोगों के यहाँ बर्तन सफाई करते हैं.”
यहाँ आने को किसने बताया?
“गाँव का एक फौजी है. बोला चंडीगढ़ पीजीआई जाओ, मुफ्त इलाज़ होगा. बोला गुरद्वारे में रहना, खाना मिल जाएगा. कार्ड मुफ्त में बनेगा. पति को बोला इलाज़ करा कर आती हूँ. मुग़लसराय का सरकारी हस्पताल में तो डाक्टर पूछते नहीं. दर्द का दवा देते हैं बस. यहाँ आई हूँ. यहाँ कोई राह भी नहीं बताता. आपने ही बात की बाबू....भगवान भला करे.”
ग़रीबी और बेबसी की जुबां आंसू होते हैं. आंसू भी लगातार कुछ बयानी कर रहे थे. वह बयानी जो उषा देवी के मुंह से नहीं निकल पा रहे थे.
मैं उसके लिए पैटीज और चाय मंगवाता हूँ. वह झिझकती है.
प्याज-लहसुन नहीं है इसमें. मैं कहता हूँ. उसको पकड़ाता हूँ. वह मेरे हाथ से खाना लेने पर फिर झिझकती है. मैं समझ रहा हूँ...इतनी आत्मीयता दिखते ही संस्कार फिर जाग उठते है..!!
मैं भी पंडित हूँ. पंजाब में शर्मा कहते हैं. उधर मिश्रा कहते हैं.
उसकी आँखों में विश्वास चमकता है. एक पैटीज खाती है, दूसरी झोला में रख लेती है.
“रात को खा लुंगी.....बेटा, मुझे वापस जाना है मुग़लसराय. गाड़ी तक पहुंचा दो.”
मैं पांच सौ रूपये देता हूँ. कुछ छुट्टे रूपये अलग से. किनले के पानी की बोतल को ध्यान देखकर झोला में रख लेती है. अब उसके मन में झिझक नहीं है. बेटा दे रहा है. बामन है. मिश्रा....!!



Tuesday, October 13, 2015

"ओये, ए तां काल्लु ऐ.....!!"

'पापा, आपको यकीन है?'
उसके कहने का मतलब आपको विश्वास नहीं होगा की क्या हो रहा है?  मैंने पूछा क्या हो रहा है?
"हमारे घर के पीछे वाले पार्क में 'थ्री' रावण बन भी गए.…!! दशहरे वाले रावण। ....!!
रावण मतलब दशहरा, बस… !! लेकिन अचरज़ बरकरार था. वही सदियों से बच्चों में पाया जाने वाला।
मुझे याद आया कि कैसे हम बच्चों को रावण के पुतले बनते देखने का चाव हुआ करता था।  हमारे घर से थोड़ी दूर सरकारी स्कूल के पास रामलीला हुआ करती थी और वहीँ पास ही रावण के पुतले बना करते थे. हम जल्दी से होमवर्क निपटा कर भागते हुए 'रावण' बनते हुए देखने जाया करते थे।  रात को रामलीला देखने जाने के लिए भी पापा को मना लिया करते थे, वो भी इस शर्त पर कि दस बजे तक वापस आ जाएंगे. असल में उन दिनों पंजाब में आतंकवाद का दौर था और कुछ चरमपंथी इस हिन्दू विचारधारा के खिलाफ थे।  रामलीला के इर्द-गिर्द काफी सिक्योरिटी हुआ करती थी. इस लिए कभी भी रामलीला का कोई भी एपिसोड पूरा देखने का मौका नहीं मिल पाया। घर वापस आ जाया करते थे लेकिन कान उधर ही लगे रहते थे. लाऊडस्पीकर पर आती 'श्री राजा रामचन्द्र की जय मनाओ आज' वाले गीत तक जागने की कोशिश करते रहते ताकि विश्वास हो जाए कि अब रामलीला खत्म हो गयी है और सभी बच्चे घर आ गए हैं.
रामलीला से याद आई एक घटना। हरियाणा के रोहतक की. कॉलेज के दिनों का वाक्या है. एक दोस्त अनिल रोहतक के वैश्य पॉलीटेक्निक में पढता था. उस से बात हुयी की दशहरे की छुटियों में घर आने का क्या प्रोग्राम है? प्लान बना कि हम कर्नाटका एक्सप्रेस से निजामुद्दीन उतरेंगे और वहां से बस लेकर रोहतक आ जायेंगे और फिर एक-दो दिन मस्ती करके चंडीगढ़ चलेंगे.
प्लान के हिसाब से रोहतक जा पहुंचे। शाम को ढाबे पर खाना खाकर घूमते हुए अनिल के ही एक दोस्त से मिलने 'झांगी मोहल्ले' जा पहुंचे. बातें करते करते रात हो गयी. दोस्त हमें ऑटो तक छोड़ने निकला ही था कि मोहल्ले की रामलीला पर नज़र पड़ी,  रुक गये. सीन था रामजी की वानर सेना और रावण की सेना में युद्ध।
बच्चे वानर सेना में रोल करके गौरवान्वित हो रहे थे।  मुंह पर लाल रंग मलकर लाल चड्डी में पूँछ लगाकर वानर सेना का हिस्सा बने हुए थे।
तभी नज़र उस बालक पर पड़ी जो वानर सेना के मुंह रंगे बच्चों में से किसी को पहचानने का प्रयास था. और कुछ देर कोशिश करने पर कामयाब हो भी गया।  सबसे अगली पंक्ति में बैठा वो बच्चा अचानक उठा और स्टेज पर वानर सेना में शामिल एक बच्चे की ओर इशारा करके खुद से ही बोला -"ओये, एह तां काल्लु ए".
और फिर जोर से चिल्लाया-"ओये काल्लु....झाई तेरी  आवाज़ाँ मारदी पयी ऐ ते तू इथे बांदर बनया होया ऐं "
(मतलब कि तेरी माँ तुझे ढूंढती फिर रही है और तू यहाँ बन्दर बना घूम रहा है …!!"

Saturday, October 3, 2015

"पापा पर इतनी भारी लकड़ियाँ मत रखो…!!"

"पापा पर इतनी भारी लकड़ियाँ मत रखो…!!"
पिछले तीन दिन से 12 साल के उस बच्चे की आवाज़ मेरे कानों और दिमाग में गूँज रही है, जिसकी फोटो मैंने सिर्फ अखबार में देखी है. जैसे ही यह आवाज सुनती है, दिल में एक हूक  सी उठ रही है.  गला भर आ रहा है, आँखों के कोने गीले हो रहे हैं. आँखों के सामने एक ऐसा सीन बन रहा है जैसे मैं शमशान घाट में उस रोते हुए मासूम बच्चे के सामने खड़ा हूँ …और वो बच्चा उसके पापा के पार्थिव शरीर पर चिता की भारी लड़कियां का बोझ सहन नहीं कर पा रहा. 
कैसे उस बच्चे ने कुछ देर बाद पापा के शरीर को अग्नि दी होगी!! "पापा जल जाएंगे। … " जैसा डर उसके मासूम दिल में कैसे उतरा होगा. 
और वो अपने 'पापा' को वहीँ जलता हुआ छोड़कर कैसे घर गया होगा। …रोते रोते सो तो गया होगा लेकिन सुबह उठते ही याद आ गया होगा कि  'पापा' तो वहीँ हैं जलती  लकड़ियों के बीच। …!! पापा जरूर बच गए होंगे, जब सब लोग उधर नहीं देख रहे थे तो पापा चुपचाप भारी लकड़ी को हटाकर निकल गए होंगे क्योंकि उन लकड़ियों के नीचे जरूर एक सुरंग होगी जैसी उसके स्कूल के पीछे वाले 'ग्राउंड' में बनी है..... और आकर पीछे वाले कमरे में छिप गए होंगे 'सरप्राइज' देने के लिये…
मुझे पूरा यकीन है घर में पसरे मातम और रह रहकर आ रही सिसकियों और बेसुध पड़ी माँ से नज़र बचाकर वो बच्चा उस पीछे वाले कमरे में गया तो जरूर ही होगा …इस विश्वास के साथ कि 'पापा' हर बार की तरह इस बार भी 'सरप्राइज' देंगे और बदले में वो जोर से चिल्लाकर माँ को 'सरप्राइज' देगा कि "ये रहे पापा तो। …!!"
मेरा दिल  इस काल्पनिक सीन को तैयार करके और 'एक्शन , रिप्ले ' करके कितनी बार रोया है पिछले तीन दिन से.…कि जब पिछले कमरे में पहुंचकर जब उस बच्चे ने लाइट जलाई होगी तो उसका विश्वास कैसे ज़र्रा ज़र्रा हुआ होगा। कितनी जोर से रोया होगा वो बच्चा ये सोचकर कि अब पापा सचमुच ही नहीं आएंगे क्योंकि वो भारी लड़कियों के नीचे से तो निकल गए होंगे लेकिन उनको घर का रास्ता नहीं याद आ होगा. पापा पहले वहां कभी गए भी तो नहीं थे…। 'मम्मी से पूछता हूँ पापा का मोबाइल कहाँ है ……!!
इस बच्चे के पापा का मोबाइल नंबर आपके पास तो नहीं होगा, लेकिन चंडीगढ़ के अफसरों के नंबर तो गूगल पर ढूंढ ही सकते हो. तो कहना एडवाइजर से, होम सेक्रेटरी से, एसएसपी से और यूनेस्को की उस टीम से भी जो ली कार्बूजिये के काम को देखने आई हुयी है… कि इस बच्चे के 'पापा' इसी 'कार्बूजिये सेंटर' में काम करता था जिसपर चोरी के किसी मामले को कबूल करने के लिए पुलिस दबाव बना रही थी.  दबाव न सहते हुए उसने आत्महत्या कर ली थी तीन दिन पहले. उस दिन घर से निकलने से वह इस बच्चे को कहकर गया था कि 'माँ को परेशान मत करना।'
बच्चा माँ को परेशान नहीं कर रहा है, इसलिए वो माँ से पूछ भी नहीं रहा है कि पापा का मोबाइल कहाँ है. 
एडवायजर साहिब, आत्महत्या के जांच के आदेशों में यह भी जोड़ना कि बच्चे के पापा को जिन भारी लकड़ियों के नीचे रखा गया था, उनके नीचे आपने सुरंग क्यों नहीं बनवायी थी.  डोरेमोन को बोल देते ....!! 

Tuesday, September 29, 2015

कहाँ गए वो लोग...


'यार माँ, ये सब क्या है? कुछ नहीं होता ये सब..श्राद्ध..!! कोई नहीं मानता. आप ही पीछे पड़े रहते हो...ये नी करना, वो नी करना. अब शॉपिंग के लिए 15 दिन रुके रहो. सब वहम है.'
ये शायद हर घर का ही किस्सा हो. मेरे घर में तो कई साल रहा...तब तक रहा जब तक खुद ये बात सुनने की हालत में नहीं आ गया. अब समझ आ रहा है कि माँ हमें अपने रिवाजों से जोड़े रखने के अलावा और कुछ भी नहीं कर रही थी. उसके पास कोई लॉजिक नहीं था, कोई जस्टिफिकेशन नहीं था. जब भी हम इन बातों का लॉजिक पूछते, उनके पास एक ही जवाब होता,'इस घर में आने के बाद तुम्हारी दादी ने जो सिखाया, वही करवा रही हूँ. मैंने भी उनसे भी कुछ नहीं पूछा था.'
और सच भी यही है. माँ वही तो करवाती रही जो दादी ने उनको कहा...मेरे पिता के परिवार के रीति-रिवाजों को आगे बढ़ाने का काम...बिना 'लॉजिक' पूछे.
आज दादा जी के श्राद्ध के दिन महसूस हुआ कि ये सब वहम नहीं है, माइथोलॉजी भी नहीं है.
तथाकथित तर्कशीलों के हिसाब से तर्कविहीन और दकियानूसी हो सकता है...लेकिन आज मेरे लिए श्राद्ध का मतलब बदलकर पितृपक्ष हो गया है. उन लोगों के प्रति श्रंद्धांजलि देने का समय जो हमारे थे..इस दुनिया में हमारे आने से पहले वे ही परिवार थे और हमें इस दुनिया में लाने वाले भी.
पितरों को याद करने के लिए साल भर में दो सप्ताह का समय तो निकाला ही जा सकता है. दो सप्ताह के लिए तो 'फिफ्टी परसेंट सेल' और 'वन प्लस वन' की सोच छोड़ी जा सकती है...
आज लगा मुझे पापा की जगह खड़े होकर "कुछ नहीं होता' या 'सब पंडितों के बनाये हुए ड्रामें' या 'आजकल कौन मानता है जैसे तर्कों का जवाब 'बेटा, जैसी आपकी मर्ज़ी'...से हटकर देना चाहिए. कि श्राद्ध 'माइथोलॉजी' नहीं हैं. ये हमारे धरम का हिस्सा भी नहीं हैं. बस अपने पूर्वजों को याद करने भर का समय है. सालभर पिज़्ज़ा पार्टी करने, शॉपिंग करने, आउटिंग करने और मोबाईल के नए मॉडल्स देखते रहने के बीच तो हम अपने जीते-जागते माँ-बाप को भी याद नहीं करते तो गुजरे हुए कल और गुजरे हुओं को कहाँ याद करेंगे...उनके ज़माने में पिज़्ज़ा और बर्गर नहीं थे...उन्हें पसंद भी नहीं होते..जैसे पापा को आज भी नहीं है....तो काम से काम जो उन्हें पसंद था...एक अच्छा सा खाना, दाल, सब्ज़ी, चपाती और खीर वाला...वो ही दे दें किसी को.. उनके नाम से....लोग वहम करते हैं टोने-टोटके का तो मंदिर वाले पंडित जी तो नहीं करते, उनको ही दे दें. रिवाज़ तो भांजे को खाना खिलाने का भी रहा है...पर अब भाइयों की बहनें ही नहीं है...भांजे कहाँ से होंगे. इकलौती संतानें हैं.
खैर, मतलब बच्चों को अपने पूर्वजों से जोड़े रखना है. हमें भी पूर्वज बनना है. बच्चों को 'फैमिली ट्री' के बारे में बताने के लिए ही पितृ-पक्ष को मानें ताकि बच्चों को पता रहे 'ग्रैंड 'पा' के भी 'डैड' थे और उनके भी 'ग्रैंड 'पा'. और उनके नाम भी थे और समाज का हिस्सा भी थे वो..
बाय द वे, आपको आपके पापा के 'ग्रैंड 'पा' के 'डैड' का नाम पता है? और आपके बेटे को आपके 'ग्रैंड 'पा' का?
सेल्फ़ी के मारी नयी पीढ़ी को 'सेल्फ' से आगे भी सिखाएं और टेक्नोलॉजी के साथ साथ परिवार के साथ भी जोड़े रखें. पितृपक्ष ब्राह्मणवादी नहीं...क्योंकि कोई भी पिता ब्राह्मणवादी नहीं होता, परिवारवादी होता है. 

Sunday, February 26, 2012

अगले जनम मोहे बिटिया न कीजो...!!!

करीब एक घंटे तक सभी कोशिशें करने के बाद जब हम उस नवजात सईनोटिक बच्ची को संभालने में कामयाब नहीं हुए तो उसे बुलंदशहर रेफेर करने का फैसला किया. रात को एक बजे उस बच्ची के परिवार के लोगों को यह बताने भर की देर ही थी रोना-धोना मच गया कहीं से गाडी का इंतज़ाम किया गया. ऑक्सीजन लगा कर उसे रेफेर करके हम गायनी वार्ड के आगे से गुजर रहे थे कि किसी के जोर जोर से बोलने की आवाज सुनकर रुके. बच्ची का दादा ऊंची आवाज में डाक्टरों पर लापरवाही बरतने का इलज़ाम लगने में जुटा था. बकौल उसके डाक्टरों की लापरवाही से बच्चे के पेट में पानी चला गया. शायद उसने सुन लिया था कि कोई सक्शन मशीन होती है जिस से बच्चे के पेट से पानी निकाला गया था.
बूढा मेडिकल की इस थ्योरी को समझने को कतई तैयार नहीं था कि दाई के चक्कर में पड़कर आठ घंटे देरी से अस्पताल पहुंचने का येही खामियाजा होता है जिसे हम 'ओब्सट्रेकटिव डिलेवरी' कहते हैं और बच्चे की जान पे बन आती है. लेकिन बूढ़े को यह समझाना बेकार था. डीसी दत्ता की 'प्रिंसिपल्स ऑफ गायनी एंड ओब्स' की मजबूरियां हमारे लिए थी, उसके लिए नहीं. वो शोर मचाता रहा और इस गलती के लिए अस्पताल की ईंट से ईंट बजा देने की धमकियों पर उतर आया था.
हम चले आये. बाद में स्टाफ में से किसी ने सुना कि वो उसके गाँव के कुछ आवारा किस्म के लड़कों को अगली सुबह अस्पताल आकर डाक्टरों को सबक सीखाने के लिए उकसा रहा था. इधर रात को बुलंदशहर में बच्चों के नामी अस्पताल तक पहुँचने के बाद बच्ची को बचाया नहीं जा सका. कोंजेनईटल मिट्रल वाल्व स्टेनोसिस शायद इसका कारण रहा हो. खैर, अगली सुबह ओपीडी के बाहर शोर सुनकर जब मैं वहां पहुंचा तो पाया कि बूढा और उसके साथ आये कुछ लोग अस्पताल के मैनेजर जीतू भाई से बहस कर रहे थे. जब तक मैं वहां पहुंचा, जीतू भाई जोर जोर से यह कहने की कोशिश कर रहे थे कि डाक्टरों के लिए हर बच्चा कीमती है. उन्होंने कोशिश की लेकिन 'छोरी' (लड़की) नहीं बची तो क्या करें. बूढा अचानक बोला-क्या कहा छोरी? वो छोरा ना था? जीतू ने बताया कि लड़की पैदा हुयी थी. इतना सुनना था कि बूढ़े ने अचानक माथे में हाथ मारा और बोला-अरे, छोरी थी तो बताया काहे न? मरन दे न फिर तो, काहे का झगडा. छोरी के मरने का कौन सा दुःख.छोरी तो भागवान की मरे है.

Wednesday, February 16, 2011

"नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर आपका स्वागत है"....!!

चंडीगढ़ के लिए शताब्दी पकड़ने के लिए प्लेटफॉर्म पर लोगों की भीड़ से टकराते-बचते मै भागा जा रहा था कि एक औरत की चीख सुनकर ठिठका. देखा प्लेट फॉर्म पर भीड़ का एक हुजूम गोल दायरा बनाए खड़ा था और उसी में से कहीं औरत की चीख आ रही थी. मेरे चलने की तेज़ रफ़्तार से कदम मिलाने की कोशिश के बाद भी कुछ कदम पीछे रह गयी डॉक्टर संजना को मैंने उसी दायरे में घुसते देखा तो मुझे भी लौटना पड़ा.
लोगों के हुजूम में घुस कर देखा तो एक औरत प्लेटफोर्म के फर्श पर लेटी थी और दो उसके बगल में बैठी मदद के लिए चिल्ला रहीं थी. देखते ही केस समझ आ गया. फुल टर्म प्रेगनेंसी और किसी फिलमी सीन की तरह प्लेटफॉर्म पर डिलीवरी की तैयारी. जितनी देर मै केस हेंडल करने का प्लान बनाता, डॉक्टर संजना फॉर्म में आ चुकी थी. पराईमी, ब्रीच,कॉर्ड स्नेप और चार किलो और सात सौ ग्राम के बेबी को नॉर्मल डिलीवरी, और वह भी बिना एपिजियोटॉमी हेंडल करने का रिस्क लेने को उतारू रहने वाली डॉक्टर संजना ने दो और औरतों का घेरा बना कर पीवी कर ली. आम तौर पर जूते के तले पर भी कीचड़ लग जाने पर हाय-तौबा मचाने वाली डॉक्टर संजना ने बिना सर्जिकल ग्लोव्स के पीवी कर ली और पाया कि क्राउनिंग हो गयी थी. अब '3 इडीएट्स ' का क्लाईमक्स रिप्ले करने के अलावा कोई चारा बचा भी नहीं था.
लोगों से भरे ऐसे प्लेटफोर्म पर जहाँ मै ट्रेन आने के दस मिनट पहले ही पहुंचना पसंद करता हूँ ताकि बहरा कर देने वाले शोर शराबे की बीच रंग-बिरंगी हरकतें करने वाले लोगों से बच सकूँ. मै वहां ऐसी स्थिति में अवाक् खड़ा था. समझ नहीं आ रहा था कि कॉर्ड कटिंग सीज़र,कॉर्ड क्लेम्प और कॉटन के बिना आखिर ये करेगी क्या? आस पास खड़े लोग हैरानी के मारे चुप हो गए. डॉक्टर संजना ने अचानक बेबी आउट किया और पास खड़े लोगों से कैंची मांगी. किसी ने शेविंग किट में से छोटी कैंची निकाल कर दी. डॉक्टर ने एक कपडा फाड़कर कॉर्ड बाँधी और काटी. डॉक्टर संजना ने मेरी ओर देखा. हर बार रिस्की केस हेंडल करने के बाद उसके चेहरे पर आने वाली जिद्दी मुस्कान.बीस सेकंड बाद बेबी के रोने की आवाज़.
.....और तभी रेलवे प्लेटफोर्म के लाउडस्पीकर पर एक चहचहाती हुयी 'फीमेल वायस '-"नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर आपका स्वागत है"....!!

Saturday, January 29, 2011

सर्दी में भी गर्मी का अहसास, चाचू मुझे पसीने क्यों आ रहे हैं..!!

कड़ाके की सर्दी की सुबह ओपीडी खुलने के पहले ही फोन आ गया कि रात को हुई डिलीवरी के चार्जेज कम करने को लेकर पेशंट के साथ आये लोग शोर मचा रहे हैं. पूछने पर पता चला कि लोग हैं तो पास के गाँव रबुपुरा के अच्छे खाते-पीते परिवार से लेकिन पहला बच्चा था, 'लड़की' पैदा होने के कारण परिवार का उत्साह ख़त्म हो गया है और इसलिए हॉस्पिटल चार्जेस कम करने की मांग कर रहे हैं. हैरानी हुयी सुनकर. इसलिए भी कि अस्पताल के चार्जेस तो पहले से ही चेरिटेबल हैं और इसलिए भी कि लड़की के पैदा होते ही इन्हें बोझ लगने लगी तो आगे इसके साथ कैसा सलूक करेंगे? और पैसे कम करने की मांग भी ऐसे लोग कर रहे हैं जिनके घर में कोई कमी नहीं है और परिवार में पहला बच्चा आया है. लड़की के लक्ष्मी होने, लड़की से ही परिवार चलने और उसकी दादी को 'तुम भी तो लड़की पैदा हुई थी' जैसे जुमले सुनाने का जब कोई असर नहीं हुआ तो मैंने 'बैड चार्जेस' छोड़ देने को कहा.
और आज फिर वैसा ही केस. गरीब आदमी हैं पास के गाँव वैना के. मजदूरी करते हैं. फुल टर्म प्रेगनेंसी, आज तक कोई चेकअप नहीं, कोई अल्ट्रा साउंड नहीं, कोई दवा नहीं. क्यों? 'साहेब, गरीब लोग हैं, खाने को भी पैसा नहीं है तो दवा कहाँ से करते. औरत की हालत ऐसी मरियल कि देखकर लगा ही नहीं कि फुल टर्म प्रेगनेंसी भी है. अनोरेक्सिक, अनिमिक.
हैरानी तो तब हुई जब लेबर रूम में पहला बच्चा एक लड़की होने के बाद जब डॉक्टर संजना ने प्लेसेंटा आउट करने के लिए सर्विक्स टटोला तो एक और बच्चे की 'क्राउनिंग' हो गयी. एक लड़का और एक लड़की, दोनों कम वज़न के. अस्पताल के मेनेजर हैं जीतू भाई, उनके पिता जी ने भी सिफारिश कर दी कि इतने गरीब हैं कि सुबह खाना खा लें तो पता नहीं कि रात को मिले कि नहीं. 'पुअर फ्री' कर दिया. डिस्चार्ज कार्ड देखा तो इस गरीब परिवार की हिम्मत देखकर पसीना आ गया. पहले से तीन लड़कियां, दो लड़के हैं और एक लड़की और लड़का अब आ गया...लेकिन इतने बच्चों और खासकर चार 'लड़कियों' को पालने की फ़िक्र का चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं. मुझे कल वाले केस के चार्जेस कम करने का बहुत मलाल हो रहा है.

Wednesday, November 24, 2010

राँग नम्बर कभी बिज़ी नहीं मिलता

उत्तर प्रदेश की एक खाप पंचायत का फरमान आया है की शादी से पहले गाँव की लड़कियों को मोबाईल फोन इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी जायेगी. इसके पीछे समाज के ठेकेदारों का यह तर्क है कि लड़कियां मोबाईल पर पता नहीं क्या खुसर-पुसर करती रहती हैं, पता ही नहीं चलता. मोबाईल फोन से होने वाले नुक्सान का पता उस दिन चलता है जिस दिन लड़की अपनी पसंद के लड़के से शादी करने के लिए घर से भाग जाती है. दिल चाहता है ऐसा नायाब "वट एन आइडिया, सर जी" देने वाले के दर्शन जरुर करने जाऊं. इन रोशन दिमागों से कोई पूछे लैला कि भला लैला के बाप ने भला कौन सा मोबाईल फोन लेकर दे रखा था उसे कि मजनू के साथ लेट नाईट चैटिंग करती थी और बाप को मालूम ही न हुआ कि लैला के फोनबुक में मजनू का नाम किसी लड़की के नाम से ऐड था.
वैसे लगभग सभी समाज शास्त्रियों की तरह इस बात से इतेफाक रखता हूँ की मोबाईल फोन के इस्तेमाल से रिश्तों में धोखाधड़ी के मामले बढे हैं. कौन किसे क्या सन्देश भेज रहा है, इसका इल्म फोन के मालिक को ही हो सकता है. इसके साथ ही यह बात भी सच है कि मोबाईल फोन ने ऐसी बातों को कहना भी आसान कर दिया है जिन्हें कहने के लिए पहले "हिमत -ऐ -मर्दा " का अहसास हो जाया करता था. ऐसे -वैसे सभी उलटे -सीधे , निहायत घटिया और बचकाने सन्देश क्लास में पढने वाली लड़की, दफ्तर में काम करने वाली या पड़ोस में रहने वाली को भेजने के लिए बस 'सेंड ' का बटन दबाना है और काम ख़तम. गाल पर 'वन टाईट सलाप ' पड़ने का खतरा ख़त्म. और वैसे भी मोबैल फोन 'मनेर्स' ने लड़कियों को भी कुछ ज्यादा ही तमीजदार बना दिया है. ऐसे -वैसे किसी एसएमएस का बुरा मनाने की बजाये वे उसे तुरंत आगे 'फॉरवर्ड' करना पसंद करती हैं. 'नेटवर्किंग ..!!'
वैसे मोबाईल फोन बैन कर देने का फरमान सुनाने वाली पंचायत को गलत कहने वालों को भी मैं एक किस्सा सुना दूं. चंडीगढ़ के सेक्टर 35 का किस्सा है सुबह 10 बजे का. एक लड़का और लड़की बैठे थे. तभी लड़की का मोबाईल फोन बजा. 'ऍक्सक्युज मी' कहकर लड़की थोडा सा दूर गयी और फोन सुना. मैं पास ही खड़ा था सो सुन पाया. लड़की ने फोन करने वाले लड़के से कहा कि वह अभी घर में है, उसकी माँ अभी घर से निकलने नहीं दे रही, इसलिए वह एक घंटे बाद काफ्फी शॉप में मिलेगी. फोन बंदकर वापस लड़के के पास पहुंची और बोली-"ममा का फोन था, कह रही थी एक घंटे में घर जरुर आ जाना ".
ऐसी बातों को सुनकर लगता है कि वही दिन अछे थे लैंड लाइन वाले. घर के सब सभी लोगों का एक ही नंबर. कोई प्राइवेट या पर्सनल काल की गुंजाइश ही नहीं थी. किसी की काल कोई भी उठा लेता था और फोन की घंटी इतनी ऊंची आवाज़ में होती थी कि पडोसी आकर बता देते थे कि तुम्हारा फोन बोल रहा है, उठा क्यों नहीं रहे. हमारे मोह्हले में रहने वाले एक अंकल का किस्सा भी ऐसे ही टेलेफोन से जुदा है. उनके दोनों बेटे शहर से बाहर रहते थे. वे देर रात गए फोन करके हाल चाल पूछते थे. और उसके बाद अंकल सारे मोह्हले को बताते थे कि रात को उनके बेटे का "टेलीफून ' आया था, वो बाहर सैर कर रहे थे , जब उन्हें टेलीफून की घंटी सुनी तो भागे -भागे गए भी, लेकिन टेलीफून कट गया. वो बहुत देर तक इस इंतज़ार में बैठे रहे कि टेलीफून फिर से आएगा लेकिन टेलीफून नहीं आया. फिर वो पास के एसटीडी बूथ से बेटे को टेलीफून करने गए लेकिन रात को 11 बजे के बाद एसटीडी के रेट आधे होने का फायदा उठा कर लम्बी बात करने वाले लोग भी टेलीफून करने आये थे.
खैर , मोबाईल फोन ने ये समस्या तो ख़तम कर दी. अब हर किसी के पास अपने दो -दो नंबर हैं, एक पर्सनल और दूसरा वैरी पर्सनल.

Sunday, September 5, 2010

मेरी बंदगी क़बूल करने को कोई खुदा नहीं उठता ..!!

यहाँ के सरकारी अस्पताल के गायनी वार्ड के बाहर पर्ची बनवाने की लाइन में खड़ी मजदूर औरत बुलबुल के वहीँ खड़े-खड़े एक बच्ची के जन्म देने और नीचे फर्श पर सर के बल गिरी बच्ची की मौत की जांच होने को लेकर कुछ तस्सली हुई कि शुक्र है एक बच्ची की जान की कीमत किसी ने तो आंकने की कोशिश की..और वह भी एक गरीब मजदूर औरत की बच्ची.
लेकिन, वहां बुलंदशहर के पास के उस कसबे के अस्पताल में पैदा हुयी उस बच्ची की मौत पर किसी ने मातम नहीं मनाया जिसे बचाने की कोशिश में उस गायनी डाक्टर ने लेबर रूम में कड़ी मशक्कत की. उस मासूम बच्ची ने लाजिमी तौर पर आदम जात लोगों से यह उम्मीद तो की ही होगी कि उसे उसकी माँ के सीने से लगने का एक मौका तो दिया ही जायेगा....पर शायद उसकी माँ के साथ अस्पताल आयी उस औरत जात इंसान को शायद यह मंज़ूर नहीं था कि उसके घर में एक लड़की आये जो बड़ी होकर उसकी ही तरह दुःख तकलीफ पाए....नौ महीने तक उसे लिए घूमने और उसे जनम देने वाली का क्या....भूल जायेगी और तीन महीने में.
मैं उसे नहीं जानता था, उसकी माँ 22 साल की पूजा को भी नहीं !! प्राईमी, हिमोलिटिक अनीमिया, अज्मैटिक !!...मुझे जब लेबर रूम से कॉल आयी तो मैं उससे मिला...'डिस्ट्रेस' में थी. 'मिकोनियम' पास कर दिया था...हुयी तो नोर्मल डिलीवरी से ही पर मैंने देखा कि बच्ची को इन्टेंसिव केअर की जरूरत थी. गायनेकोलोजिस्ट से सलाह के बाद मैंने उसके अटेंडेंट को उसे बुलंद शहर ले जाने की सलाह दी.
सुबह खबर आयी कि बच्ची बच नहीं पायी...मुझे कुछ हैरानी हुयी, इसलिए कि बच्ची डिस्ट्रेस में जरूर थी लेकिन इतनी क्रिटिकल भी नहीं थी. बाद में स्टाफ ने बताया कि बच्ची को गाडी में ले जाते हुए तो देखा था, और यह भी कि बच्ची की 'बेचारी' दादी बच्ची को चम्मच से दूध पिलाने की कोशिश भी कर रही थी...!! मैं केस समझ चुका था..!! वार्ड में राउंड के दौरान मैंने पूजा को बेबसी भरी आँखों से लेबर रूम की तरफ टकटकी लगाकर देखते हुए पाया. इस उम्मीद में कि शायद उधर से कोई मासूम सी किलकारी सुन जाए..!! पर अफ़सोस..!!
और डाक्टर अनुराग, पता नहीं क्यों मुझे आपकी याद बहुत आयी जब पूजा को डिस्चार्ज करवाकर ले जा रही उसकी सास ने अपनी बेटी की मौत का मातम मना रही एक माँ के आंसूओं को ड्रामा बता कर उसे डांट दिया...लेबर रूम से किसी आवाज़ सुन जाने की आखिरी उम्मीद पर पीछे मुड़-मुड़कर देखती पूजा को मैं उस वक़्त भागकर पकड़ने से खुद को रोक नहीं पाया जब मैंने देखा, उसके परिवार के लोग उसे वहीँ सड़क किनारे छोड़कर गाडी भगा ले गए...धूल के गुब्बार में अज्मैटिक अटैक का शिकार होकर बेदम होती एक और माँ..!!

Saturday, April 24, 2010

चुप रहेगी अगर जुबान-ऐ-खंजर, लहू पुकारेगा आस्तीन का...

पीएमटी एक्साम देकर सेंटर से बाहर निकलते ही डीएवी कल कोलेज के बाहर एक पेड़ के नीचे खड़े कुछ लोगों का वह खुसर-पुसर करता झुण्ड मुझे अब तक याद है..एक बड़ी सी गाड़ी के आसपास एक सांवले और मोटे से आदमी से कुछ बच्चों के मां-बाप पैसों के बारे में बात कर रहे थे. वह आदमी बदले में अपना विजिटिंग कार्ड दे रहा था. बाद में पता चला कि वह कर्नाटका के एक प्राईवेट मेडिकल कोलेज का एजेंट था. उन दिनों वह मेडिकल कोलेज में दाखिले के आठ लाख मांग रहा था. चूँकि उन दिनों यह प्राईवेट मेडिकल कोलेज खोलने का धंधा इधर उत्तर भारत के पैसे वालों और नेताओं को नहीं सूझा था. सो हमारे यहाँ चंडीगढ़ और पंजाब के अधिकतर बच्चे कर्नाटका के मेडिकल और इंजिनीयरिंग कोलेजों में ही जाते थे. वहीँ फीस कुछ कम थी. उसके कुछ दिनों बाद चंडीगढ़ के अखबारों में रशिया में मास्को से एमबीबीएस में दाखिले के विज्ञापन भी बहुत छपे. मेरे भी दो दोस्त मास्को गए.
हमारे पास न तो पैसा था और न ही मां-बाप में मुझे विदेश भेजने के लिए जोड़-जुगाड़ का मादा. पर भगवान् की मेहरबानी ही कहूँगा कि पीएमटी के पहले ही अटेम्प्ट में तुक्का लग गया और दाखिला हो गया, नहीं तो....!!
इसीलिए कल जब अखबार में मेडिकल काउन्सिल के चीफ केतन देसाई की गिरफ्तारी की खबर पढ़ी, मुझे कोई ख़ास हैरानी नहीं हुयी. हैरानी इस बात पर हुयी कि इतने साल बाद यह ड्रामा क्यों? क्या इसमें भी वही रटा-रटाया तर्क है कि किसको हिस्सा नहीं पहुंचा जो केतन देसी को पकडवा दिया? यह बात देश भर के सारे डॉक्टर, उनके मां-बाप, देश भर में चल रहे मेडिकल कोलेज और सरकार भी जानती है कि देश भर के प्राईवेट मेडिकल कोलेजों में लाखों रुपये कपिटेशन फीस ली जाती है, और सरेआम ली जाती है, तो यह कैसे हो सकता है कि प्राईवेट मेडिकल कोलेजों को परमिशन बिना कुछ लिए-दिए मिल जाती होगी? केतन देसाई ने दो हज़ार करोड़ रूपये ऐसे ही तो इकट्ठे नहीं किये? यह ज्ञान सागर मेडिकल कोलेज वाले दो करोड़ रूपये लेकर केतन देसाई के पास पीजी कोर्स चालने की परमिशन लेने ही गए थे. यह मेडिकल कोलेज चंडीगढ़ के नजदीक ही है, पटियाला जाते समय बाहर से बिल्डिंग देखने का मौका भी मिला, पता नहीं इतना पैसा कहाँ से लगा रखा है?? पूरा तो हो ही जाना है. पंजाब के लगभग सभी पोलिटिकल लोगों ने मेडिकल कोलेज, इंजिनीयरिंग और मैनेजमेंट कोलेज खोल लिए हैं. पहले कहते थे कि साउथ वाले पोलिटिशियन धंधे के लिए या तो मंदिर खोलते हैं या मेडिकल और इंजीनियरिंग कोलेज. अब हमारे इलाके के सारे सरदारों ने या तो मेडिकल, नर्सिंग और एमबीऐ के कोलिज खोल लिए हैं या फिर प्रोपर्टी डीलर के दफ्तर.,
केंद्रीय हेल्थ मिनिस्टर रहे डाक्टर अम्बु मणि रामदोस से एक बार मिलने का मौका मिला था, तो मैंने उनसे देश में डाक्टरों की कमी और करीब दो लाख ऐसे डाक्टरों के मुद्दे पर बात की थी जिन्होंने विदेश से एमबीबीएस की है, लेकिन मेडिकल काउन्सिल ऑफ़ इंडिया ने उन्हें रजिस्ट्रेशन देने के लिए टेस्ट रखा हुआ है. उनका जवाब था , 'आई विल सी इट'. अबके हेल्थ मिनिस्टर गुलाम नबी आज़ाद भी येही कहते फिर रहे हैं कि देश में डाक्टरों की कमी पूरी करने के लिए पीजी सीटें बढ़ा रहे हैं. उन्हें कोई बता दे कि दिल्ली के युसूफ सराय इलाके के पीछे गौतम नगर है, जहाँ रशिया से एमबीबीएस करके आये हज़ारों युवा डाक्टर पेईंग गेस्ट रह रहे हैं. दिल्ली के प्राईवेट नर्सिंग होम में सिर्फ दस-दस हज़ार रूपये में आरएमओ लगे हैं. रात को ड्यूटी करते हैं, दिन में मेडिकल काउन्सिल के 'ऍफ़एमजीई' के टेस्ट की कोचिंग लेते हैं. साल में दो बार होने वाले इस टेस्ट में कई हज़ार डाक्टर हिस्सा लेते हैं और पास होते हैं सिर्फ आठ से नौ परसेंट.
यह बात भी मुझे किसी ख़ास ने बतायी कि प्राईवेट मेडिकल कालेजों की लोबी के चलते मेडिकल काउन्सिल ने यह टेस्ट इतना मुश्किल रखा है कि ऐमस से एमडी कर चुके किसी डाक्टर से भी पास न हो सके. येही कारण है कि यहाँ की मेडिकल कोलेज लोबी विदेशों से डिग्री लेने वालों की बजाये यहाँ दाखिला लेने को मजबूर कर रही है ताकि कैपिटेशन फीस मिले. केतन देसाई की गिरफ्तारी से यह पहलू भी साफ हो गया है.
सरकार को अब शायद यह समझ आ जाये कि इन डाक्टरों को रजिस्ट्रेशन देने में मेडिकल काउन्सिल में हो रही धांधली को रोक कर वह गावों में डाक्टरों के कमी पूरी कर सके.

Saturday, February 27, 2010

अब दुआ अर्श पे जाती है असर लाने को...!!

कल ही मेरी नज़र उस पर पड़ी. हालांकि इस इलाके के बाकी सभी लोगों की तरह मेरे आने-जाने का रास्ता भी वही एक है, लेकिन दिनभर का रूटीन दिमाग में लेकर सुबह काम पर भागने की जल्दी में मैंने उसकी और ध्यान नहीं दिया और रात देर गए लौटने के समय तक वह जा चुका होता है. लेकिन शनिवार की सुबह जब बेटे को स्कूल छोड़ने निकला तो मैंने उसे देखा. घरों के इस तरफ के ब्लोक से बाहर निकलने और मेन सड़क मिलने के मोड़ पर पार्क के कोने में वह खड़ा था. नीचे जमीन पर छोटी-छोटी शीशियाँ राखी थी जिनमें से एक-आध में कुछ तेलनुमा भरा हुआ नज़र आ रहा था. और पीछे पार्क की रेलिंग पर उसने एक बैनर बाँध रखा था जिसपर 'तेल मालिश, जोड़ों के दर्द का इलाज़' लिखा हुआ था.
ध्यान उसपर इस लिए नहीं गया कि शहर भर में जगह जगह खुले फिजियोथेरेपी सेंटरों के रहते हुए भला इसने इतना बड़ा रिस्क कैसे लिया ऐसे बिजनेस का, और वह भी ऐसे इलाके में जहाँ घरों के चार ब्लॉक में अस्पतालों में जान पहचान रखने वाले मुझ समेत तीन डॉक्टर और सरकारी अस्पतालों में काम करने वाली कम से कम चार नर्सें रहती हैं जो पर्ची बनवाने और लाइन में लगने के झंझट से बचाने में कारगर हैं. और यह भी कि जहाँ इस बूढ़े ने यह बिजनेस शुरू किया है, उसके बा-मुश्किल आधा किलोमीटर दो नर्सिंग होम भी हैं जहाँ आर्थोपेडिक डिपार्टमेंट ठीकठाक हैं.
मेरा ध्यान उस साठ साल के बूढ़े की और इसलिए गया क्योंकि एक तो वह मेरे हिसाब से कुछ ज्यादा ही जल्दी काम पर आ गया था. मेरे ख्याल से घुटनों-जोड़ों के दर्द वाले बुजुर्ग अच्छी-खासी धूप निकलने के बाद ही घरों से निकलकर यहाँ सरेआम घुटनों की मालिश कराने आयेंगे...और दूसरी बात यह कि वह बूढा आराम से बैठकर ग्राहकों का इंतज़ार करने की बजाय खड़ा होकर हर आने-जाने वाले को हाथ उठा कर सलाम कर रहा था. पता नहीं क्यों उसका यह तरीका दिमाग में कहीं बैठ गया. सोचा शायद मार्केटिंग का तरीका है कि लोगों की नज़रों में आया जाये और फिर बिजनेस करे.
लेकिन मन माना नहीं. बच्चे को स्कूल छोड़कर जब वापस लौटा तो भी उस बूढ़े को उसी अंदाज में पाया. हर आने-जाने वाले को सलाम करते हुए. ऑफिस के लिए जब निकला उस समय तक सड़क पर भीड़ कम हो चुकी थी. मेरी गाडी को देखते ही उसने फिर उसी अंदाज में सलाम किया तो मैं रह नहीं सका और उसतक जा पहुंचा. मेरा सवाल-यह हर किसी को सलाम करके ग्राहक बनाने का तरीका क्या काम करेगा? जवाब-क्या आपने मेरे पास ग्राहकों की भीड़ देखी? नहीं..!! मैं सलाम नहीं करता..मैं यहाँ से गुजरें वालों के लिए दुआ मांगता हूँ कि उनके हाथ-पाँव सलामत रहें..शाम को सलामती से लौट आयें..जिन बच्चों के पास बुजुर्गों के पाँव दबाने की फुर्सत नहीं है, मैं तो उनके लिए बैठा हूँ...!!
क्या आपके पास है कोई जवाब??
एक और ऐसी ही घटना मुझे याद आयी है. कोई दस साल पहले की बात है. शाम को दिन ढले ऑफिस जाते समय ऑफिस के मोड़ से कुछ पहले पूर्वी दिशा में लगे पोपलर के पेड़ों की ओर मुंह ओर छिपते हुए सूरज की ओर पीठ किये हुए एक गरीब सा दिखने वाला बूढा आसमान की ओर बाहें उठाये कुछ बोल रहा था. पेड़ों से बात करने वाले किसी चरवाहे जैसी किसी कहानी का पात्र. एक महीना लगातार देखने के बाद मुझसे नहीं रहा गया. गाडी ऑफिस में पार्क करके सैर करने के बहाने मैं उसके पास पहुंचा...बूढा सचमुच पेड़ों से बात कर रहा था..'तुम महान हो..हम से बड़े हो..इन बच्चों को सांस लेने लायक साफ़ हवा देते रहना...हर मौसम में, मेरे बाद भी !!!

Thursday, September 3, 2009

कहते तो सही हो, डाक्टर अनुराग...!!!

डाक्टर अनुराग सही कहते हैं, दुखों के जेरोक्स मशीन की वसीयत औरतों के नाम न सही, लेकिन उस वसीयत की एक-एक फोटोकॉपी हरेक औरत के पास है.
बुलंदशहर के पास एक कसबे जेवर में जाना हुआ जहाँ एक दोस्त गायनेकोलोगिस्ट है. हैरानि होती रही दिन भर ओपीडी में बैठे हुए. उम्र 20 साल, नौ महीने का गर्भ, मल्टी ग्राविडा, एचबी सिर्फ 5 ग्राम और इंशाअल्लाह रोजे रखे हुए हैं. डाक्टर कहती है रोजा नहीं रखो, मर जाओगी. साथ आयी सास कहती है-यों न होने का डाक्टर साहिब. साल भहर में एक दफा तो रमदान का महीना आवे है. सालभर खाना ही होवे फिर. सही है, सास-बहु दोनों के पास पक्के तौर पर दुखों के जेरोक्स कापी है.
और यह जो औरत आज दाखिल हुयी है, इसके पास तो वसीयत की रजिस्ट्री भी है. उम्र कोई बीस साल, पेशा मजदूरी. पहला बच्चा, झुग्गी में ही किसी दाईनुमा औरत ने उस वसीयत की कापी इस औरत को भी सौंप कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी.
बच्चा तो पैदा करवा दिया पर कुछ हिस्सा भीतर छूट गया जिसे हम मेडिकल वाले रिटेनड प्लेसेंटा कहते हैं. सड़क पर मजदूरी करने वाला शौहर हेवी ब्लीडिंग और कन्वेलसेंस की हालत में लेकर अस्पताल पहुंचा. खुद भी बदहवासी में. मरीज की हालत खुद ही गरीबी बयां कर रही थी और उसके शौहर ही हालत उसक मजबूरी और बेबसी की. उसके पास एक भी पैसा नहं था इलाज़ के लिए. कुछ घंटों पहले पैदा हुयी नन्ही सी जान को हाथों में लिए वह डाक्टर संजना के सामने उस औरत को किसी भी तरह बचा लेने के लिए गिडगिडा रहा था.
ऐसे मरीज भी शायद ऐसे ही कमजोर दिल डाक्टरों का पता भगवान् से ही पूछ कर आते हैं, जो हाथ जोड़कर नीच फर्श पर बैठ जाने वाले गरीब मरीज को देखकर डिग्री लेते हुए खाई 'हिप्पोक्रेटिक ओथ' को हनुमान चालिषा की तरह दोहराने लग जाते हैं.
मै देखता हूँ डाक्टर संजना बेबसी की जुबां पढ़ रही है. जल्दी से ब्लड सैम्पल लिया गया. जांच रिपोर्ट आ गयी है. टायफायड, मलेरिया पाजिटिव और एचबी सिर्फ चार ग्राम. घंटे भर की मेहनत के बाद मरीज़ औरत कुछ शांत लगी. हम लोग ओपीडी के बाद चाय पीने बैठे ही हैं कि फिमेल वार्ड की नर्स भागी आयी-डाक्टर साहिब, पांच नंबर वाली कि पल्स नहीं मिल रही. भागकर गए तब तक मौत बाज़ी ले जा चुकी थी. नन्हीं जान ने मां के शरीर की छुअन भी नहीं महसूस की थी और मां बच्ची को सीने से भी नहीं लगा सकी. माहौल ग़मगीन पहले ही था कि अचानक किसी पुरानी हिंदी फिल्म में बाप का किरदार निभाने वाले नासीर खान जैसा गरीब बूढा कमरे में दाखिल हुआ और दुधमुन्हीं बच्ची को चूमते हुए सिसकते आदमी के सामने हाथ खोलकर खडा हो गया. कहीं से कुछ हज़ार रूपये मांगकर लाया था उसका बाप. 'बेटा, देर हो गयी क्या आने में मुझे?'

Sunday, August 16, 2009

इरशाद आजकल...!!!

बात शायद 1997 की सर्दियों की है. चंडीगढ़ में जनसत्ता अखबार के दफ्तर में चाय की चुस्कियों के दौरान जब इरशाद ने बताया कि वह बॉम्बे जा रहा है फिल्मों के लिए लिखने के लिए, तो मैंने मजाक में कहा-'हाँ जा यार, हम भी फिल्म इंडस्ट्री में किसी को जानने लगेंगे. फिर तेरे साथ फोटो खिंचाकर खुश होंगे. पर साले तू कहीं हमने पहचानने से भी इनकार मत कर देना'. इरशाद ने पुख्ता आवाज़ में कहा था-'तुझे ऐसा लगता है?' मैंने क्या कहा था ये तो मुझे ठीक से याद नहीं, लेकिन इरशाद ने यह कहा था तेरे नाम से बुलाकर मिलूँगा.
ऐसा हुआ भी. कल मुझे जब एक पुराने साथी का फोन आया कि इरशाद आया हुआ है चंडीगढ़. कल आ जाना एक फंक्शन में, वहीँ मिलेंगे. जब मैं वहाँ पहुंचा तब तक इरशाद पहुंचा नहीं था. हम लोग बाहर ही खड़े होकर उसका इंतज़ार करने लगे. एक घंटा लेट था इरशाद. हम बातें करने लगे की इन लोगों के साथ यह समस्या होती ही है, देर से आने की. खैर, इरशाद की गाडी दूर सड़क पर ही रुक गयी. उसमें से इरशाद और इम्तिआज़ निकले और पैदल चलते हुए आने लगे. हमें देखते ही इरशाद तेजी से आया और दूर से ही बोला-'और रवि, क्या हाल है?' इरशाद ने बारह साल पहले कही बात को सिद्ध कर दिया.
इसके बाद करीब एक घंटा साथ रहे और ढेर सी बातें की. बाकी दोस्तों के साथ-साथ मैंने भी कोशिश कि हम दोनों के बीच कहीं वह दीवार मिल जाए जिससे मैं महसूस कर सकूं की मेरे साथ बैठा इरशाद अब 'जब वी मेट' और 'लव आजकल' जैसी कामयाब फिल्मों का गीतकार इरशाद कामिल है और उसके साथ इन फिल्मों का डायरेक्टर इम्तिआज़ अली है. बहुत कोशिशों के बाद मुझे मानना ही पड़ा कि इरशाद आज भी कल वाला वही इरशाद है जिसके खाते से हम चाय मंगवा कर पीते रहते थे और बाद में इरशाद केन्टीन वाले कौशल के साथ हिसाब को लेकर बड़ी तमीज के साथ बहस करता था.
और इरशाद ने बड़ी साफ़गोई से यह भी बता दिया कि वह पहले भी यहाँ आता रहा है, लेकिन दोस्तों से मिलने का वक़्त नहीं निकाल पाया. हाँ, अपने घर मलेरकोटला जरूर गया. 'चमेली' और 'जब वी मेट' के बाद बाद भी और अब 'लव आजकल' की कामयाबी के बाद भी. और उससे मिलने के बाद मुझे लगा कि कुछ लोग कभी नहीं बदलते. कल भी वही थे, और आज भी. मैंने उससे पूछा यहाँ के दोस्तों को याद क्यों रखा हुआ है? तो इरशाद का जवाब था-जो गीत सुन रहे हो न, उनके लिए शब्दों के झोली यहीं से भरता हूँ.
खैर जाते जाते इरशाद ने मुझे यह भी बताया कि जनसत्ता अखबार से मिला कुल 327 रुपये का आखिरी चेक फ्रेम करवा कर रखा हुआ है. और मैंने भी उसे यह बता ही दिया कि केन्टीन वाले कौशल ने आज भी तुम्हारा 21 रूपये का हिसाब रखा हुआ है. (उसी चाय का बिल जो हम दोस्तों ने पी थी जब एक नाटक की कवरेज़ के लिए इरशाद टैगोर थिएटर गया हुआ था.)

Wednesday, June 24, 2009

मेरा दिल भी जिद पर अड़ा है किसी बच्चे की तरह...

मैं उसे अब तक कम ही जान पाया था, कल रात के बाद मुझे उसका एक अलग रूप नज़र आ रहा है। पता नहीं पिछले बारह साल तक मैंने उसमें एक जिद्दी बच्चे को क्यों नहीं देखा। हाँ, मैं राकेश की ही बात कर रहा हूँ। कल शाम ऑफिस से जल्दी काम निपटा लेने के बाद जब मैं उसके दफ्तर पहुंचा तो वह 'यूट्यूब' पर नूरजहाँ का गया 'लो फिर बसंत आया' ढूँढने में व्यस्त था। हालांकि उसने मुझे लम्बी सैर करने के लिए बुलाया था जो हम दोनों की बारह के पुरानी दोस्ती का एक सूत्र है.
उन दिनों जब हम में से किसी पर भी परिवार की जिम्मेदारी का अहसास हावी नहीं हुआ था और देर रात तक घर से बाहर रहने पर कोई जवाब नहीं देना होता था, तब राकेश और मैंने कई साल तक चंडीगढ़ में सुखना झील के किनारे-किनारे आधी रात बीते तक लम्बी सैर की हैं। मैं उन दिनों जनसत्ता अखबार में रिपोर्टर था और राकेश दिव्य हिमाचल नाम के अखबार में। मेरा दफ्तर उसके दफ्तर और घर के बीच में था. राकेश क्राईम रिपोर्टर था और डाक्टरी का ठप्पा लगा होने के कारण मैं 'हेल्थ कोरेस्पोंडेंट'. आधी रात को राकेश मेरे दफ्तर पहुंचता.मेरे दफ्तर की कनटीन में 'थाली' खा लेने के बाद हम दोनों अपने स्कूटरों पर लम्बी सैर को निकलते थे. झील पर जाकर स्कूटर एक कोने में फेंकते और झील के किनारे किनारे अँधेरे में गीत-गज़लें गाते-गुनगुनाते करीब पांच किलोमीटर की सैर करते. इस दौरान हम दिन भर की घटनाओं का जिक्र करते और भविष्य के लिए देखे जा रहे कुछ सपनों का भी. उनमें से एक कार खरीदने लायक पैसा जमा कर लेने का जिक्र रोज़ होता था. कई बार ऐसा भी होता था कि राकेश आते आते रास्ते में ही दारु का दौर पूरा करके आता था. ऐसे रोज़ राकेश की बातों में कुछ गुस्सा भी दिखता, लेकिन अगले ही पल वह खुद को रोक भी लेता. ऐसे ही पीने के बाद शुरू हुई चर्चा में एक अधकही सी कहानी भी शामिल हुई, जिसके बारे में तफसील देने से पहले ही सैर खत्म हो गयी.
उसके बाद राकेश की मित्र-मंडली में कुछ और रिपोर्टर शामिल हुए जो पीने-पिलाने के शौकीन थे. नहीं पीने वालों में होने के कारण हम दोनों के रोज़ मिलने के कारण कम होने लगे और सैर के बहाने भी. नौकरी करते करते कब दस साल बीते, पता ही नहीं चला.
पिछले कुछ महीनों से राकेश और मेरा सैर का बहाना फिर से बनने लगा तो मैंने पाया कि उसने कुछ जयादा ही पीनी शुरू कर दी थी. लगभग रोज़. और पिछले एक महीने से तो ऐसा होने लगा था कि सैर के बाद उसने मेरी कार में बैठकर पीने के लिए कहा. मेरे लिए वह कोका कोला की बड़ी बोतल लाता. अकेले पीने की उसकी इच्छा को पता नहीं क्यों मैं लगातार नोट करता आ रहा था. कल रात को सैर करने के बाद जब राकेश ने पीने के इच्छा जताई तो मैंने कार में बैठकर पीने की बजाय घर चलने को कहा. गर्मी से बचने के लिए पत्नी और बच्चा शिमला गए हुए हैं. ऐसे में राकेश भी मान गया. शायद घर के माहौल का असर ही था कि पीने के दौरान राकेश की सुई घर-परिवार की जिम्मेदारी पर आ टिकी. उसने कहा कि उसे लग रहा है पिछले दस साल का उसके पास कोई रिकार्ड नहीं है कि कैसे यह वक्त बीत गया था. घर परिवार की जिम्मेदारी ढोते. दिन रात घर परिवार की सुख-सुविधाओं के बारे में सोचते करते. इस दौरान खुद के लिए सोचने का भी वक्त नहीं मिला. और यह सब करने के दौरान ही उसे लगने लगा है कि खुद उसके लिए कुछ नहीं हो रहा. ऐसे में एक जिद्दी बच्चे की तरह उसने मुझसे कहा-'मैं क्यों सोचूँ किसी के लिए॥मैं तो पीयूँगा??'
(शायद हम सब में एक बच्चा छिपा बैठा है कहीं.)

Monday, June 22, 2009

किवें ऐ बाई हरमन सिद्धू....!!!

वैसे तो 23 साल किसी को भूल जाने के लिए कम नहीं होते. और ऐसे किसी इंसान को भूलने के लिए जिसे आप ठीक से जानते भी न हों. लेकिन पता नहीं क्यों हरमन सिद्धू के मामले में मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ. हरमन को मैं कल पूरे 23 साल बाद मिला. हरमन और मैं पहली बार 10+1 में पहले दिन चंडीगढ़ के सरकारी कालेज में मिले थे. कितने दिन साथ साथ बैठे इसकी ठीक ठीक याद मुझे नहीं है, लेकिन पिछले हफ्ते नेट्वर्किंग साईट 'फेसबुक' में जब मैंने उसे देखा तो कालेज में पहले दिन की यादें ताजा हो गयी. याद आया कैसे छोटे से स्कूल से निकलकर पहले दिन इतने बड़े कालेज में जाना अपने ही शहर दिल अजनबी हो जाने का अहसास दे रहा था. पुराने दोस्तों में से किसी को ढूढती निगाहें इधर-उधर घूम रही थी. नोटिस बोर्ड पर क्लास का अता-पता लगाकर पहुंचा 'एलटी-1' यानी 'लेक्चर थिएटर-1'.
पहली बार सिनेमा हाल जैसी सीढियों जैसी क्लास में लम्बे-लम्बे बेंच पर बैठे मेरे जैसे नए लोग. आगे से तीसरी लाइन में बाएँ तरफ जाकर बैठ गया. सुबह आठ बजकर दस मिनट पर पहला लेक्चर था केमिस्ट्री का. लेक्चरर डाक्टर अत्तर सिंह अरोरा अभी तक पहुंचे नहीं थे. सीट पर बैठकर क्लास का जायजा लिया. बाएँ तरफ लड़कियां बैठी थी और अधिकतर लड़के दाईं तरफ बैठे थे. बाईं तरफ दीवार में एक बड़ी सी खिड़की खुलती थी जहाँ से बाहर एक छोटा सा मैदान था जिसके किनारे किनारे पीले रंग के फूल झूम रहे थे. बरसात का एक दौर सुबह ही गुजर चुका था.
इसके बाद मैं वापस क्लास में लौटा. मेरे साथ बाईं तरफ जो लड़का बैठा था उससे मैंने हाथ मिलाया. 'रविंदर', 'हरमन'!!! बस इतनी याद ही है मुझे उस दिन की और हरमन से पहली मुलाक़ात की. इसके बाद एक दिन और याद है जब कालेज की कैंटीन को बदल कर 'न्यू ब्लाक' के पास चली गयी थी और वहीँ एक दिन चाय लेने के लिए काउंटर की लाइन में खड़े हरमन का चेहरा मुझे याद है. उसके बाद वह साल और उसके अगला साल कहाँ गुजरा मुझे याद नहीं. बस यह याद है कि कालेज कि बिल्डिंग और क्रिकेट मैदान के बीच किनारे पर खड़े नीम्बू-पानी वाली रेहड़ी वाले के पास से गुजरने वाली कालेज की एकमात्र 'जींस वाली लड़की' को देखने के लिए हरमन मुझसे भी पहले पहुंचा होता था. हमारे कालेज हमारे एक ही लड़की थी उन दिनों जो जींस पहनने की हिम्मत करती थी. वैसे तो हमारा कालेज उन दिनों 'फार बायज' था लेकिन बी.काम कोर्स में लड़कियां भी थी. उन्हीं लड़कियों में से एक थी वो जींस वाली. उसका नाम हमें तो पता नहीं था लेकिन सीनियर्स से सुनकर पता चला था कि उसका नाम शायद किरन ढिल्लों था. सरदारनी थी. लम्बी और पतली सी. उसकी क्लास शायद दोपहर12:50 बजे ख़तम हो जाती थी और उस समय हमारा अंग्रेजी का पीरियड होता था. उसके के बाद बचता था एक पंजाबी का. सो, पंजाबी का लेक्चर 'बंक' करके हरमन मुझसे पहले नीम्बू-पानी की रेहड़ी पर पहुँचता..उसके पीछे पीछे मैं और अनुराग अबलाश.
किरन ढिल्लों दूर से ही न्यू ब्लाक से निकलती हुयी दिखती और धीरे धीरे से गेट से बाहर चली जाती. पीछे रह जाते हम. किरण ढिल्लों की जींस चर्चा का एक कारण यह भी था कि उन दिनों पंजाब में आतंकवाद की लहर चल रही थी. दो साल पहले ही '84' के दंगे होकर हटे थे. उसके चलते खाड़कू और सख्त हो गए थे और उन्होंने चंडीगढ़ समेत पूरे पंजाब में 'ड्रेस कोड' लागू कर दिया था जिसमें लड़कियों को सिर्फ सूट-सलवार पहनने और सर ढककर रखना भी शामिल था. ऐसे हालातों में किरन ढिल्लों का सरदारनी होकर जींस पहनना एक बड़ा साहसिक कदम था.
खैर, हरमन के बारे में फेसबुक पर पढ़ते ही मैंने उसे सन्देश भेजा और फिर मोबाईल नम्बर लिया और उससे मिलने जा पहुंचा. हरमन बदल गया था. पूरी तरह. मैंने उसे ऐसा देखने ही उम्मीद नहीं कि थी. सोचा था कि वह पहले की तरह उठकर गले मिलेगा और चंडीगढ़ के 'टिपिकल' तरीके से कहेगा 'किवें बाई जी'. पर ऐसा हुआ नहीं
हरमन 'व्हील चेयर' पर था. कोई 13 साल पहले एक कार दुर्घटना में उसकी रीढ़ की हड्डी में चोट लगी और शरीर के निचले हिस्से ने काम करना बंद कर दिया. पिछले 13 साल से हरमन व्हील चेयर पर है. लेकिन वह जो कर रहा है वह सभी नहीं कर सकते. हरमन 'अराईव सेफ' नाम की एक संस्था चला रहा है जो दुनियाभर परा सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए जागरूकता फैलाने का काम कर रही है. हरमन का नारा है 'अराईव सेफ' यानी सुरक्षित वापस घर पहुचें. हरमन इस दिशा में कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार ले चुका है. और अब देश की कई राज्य सरकारों के अफसरों को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि दुर्घटनाएं न सिर्फ वर्तमान और भविष्य को ख़त्म करती हैं, बल्कि यादों को भी ठेस पहुंचाती हैं...!!!
हरमन से मिलने के बाद मुझे याद आया कि किरन ढिल्लों को देखने के लिए मुझसे आगे भागता हुआ हरमन कितना सुंदर लगता था.

Saturday, May 30, 2009

कोड वर्ड का मतलब.

मसला इस बात पर उठा है कि घर के सदस्यों के पास एक ऐसा कोडवर्ड होना चाहिए जिसको सिर्फ वही जानते हों ताकि मुसीबत के समय मदद मिल सके. कोडवर्ड का मामला भी अभी चंडीगढ़ के एक अखबार ने सुझाया है. असल में हुआ यह कि चंडीगढ़ के बिजनेसमैन ललित बहल को दिल्ली से चंडीगढ़ लौटते समय रात को कुछ लुटेरों ने उनकी गाडी सहित अगवा कर लिया. ड्राईवर समेत जब बहल को उन्हीं कि कार में लेकर लुटेरे जब बहल के घर पहुंचे और गेट खुलवाया तो उन्होंने इशारे से पत्नी को बताने कि यह लोग 'रोबर्स' हैं. पत्नी ने दरवाजा खोल दिया. लुटेरे सारे परिवार को बंधक बना कर रातभर घर की तलाशी लेते रहे और लूटपाट करके चलते बने. बाद में बहल की पत्नी ने बताया कि उन्हें लगा लुटेरे उनके पति के दोस्त थे और उनका नाम 'रोबर्स' था. जय हो...!
खैर, इसी बात से मुझे कोडवर्ड रखने वालों के कई किस्से याद आ गए. उनमें से कई कोलेज के दिनों के हैं जब एक-दूसरे को सीटी बजाकर या किसी और तरीके से सिग्नल दिया करते थे. कई प्रोफेसरों के नाम कोड वर्ड प्रणाली के शिकार थे. 'बाबा' , 'मोटू', या लपूझन्ना की तर्ज पर नेस्ती मास्टर टाईप.
फिर यह भी पता लगा कि कोड वर्ड कि माया पूरे शहर में ही फैली थी. पुरानी बात है. पंजाब में आतंकवाद था और पुलसिया राज था. जगह जगह सड़कों पर तलाशी-नाके. और पुलिस वाले थे कि कोलेज में पढने वालों को ज्यादा ही रोकते थे-पैसे ऐंठने के चक्कर में. फिर एक कोड वर्ड निकला 'मामे'. पंजाब भर में चला. आज भी चल रहा हर. चंडीगढ़ में एक तरफ से आने वाले दूसरी और से आने वालों को पूछते थे ' मामे?' दूसरा हाथ हिला कर चला जाता था. या फिर बिना हेलमेट पहने मोटरसाईकल चलाने वाले लड़के एक दूसरे को भली मानसियत दिखाते हुए खुद ही बता देते थे कि आगे मामे हैं. और हम रास्ता बदल लेते थे.
उन दिनों मोबाईल फोन नहीं थे. लैंडलाइन हुआ करते थे. तो घंटी बजाकर मेसेज भेजने का तरीका भी चला. दो छोटी घंटी का मतलब सामने वाली लड़की को बालकोनी में बुलाना था और एक का मतलब अभी रास्ता साफ़ नहीं है. आधी रात को एक छोटी सी घंटी का मतलब 'गुड नाईट' हुआ करता था. यह बात और है कि घर में सब जान चुके थे कि रात को दस बजे एक घंटी बजनी ही है.
ऐसा ही जुगाड़ हमारे एक दोस्त ने भी लगाया. हुआ यूँ कि कोलेज के दिनों में हम हॉस्टल के कमरे से परेशान होकर उसके किराए के कमरे पर दोपहर बिताने जाने वाले थे. उसे एक दिन पहले ही बता दिया गया था कि हम दोपहर को आ जायेंगे और नुक्कड़ के ढाबे से चावल राजमा लाकर रखना और दही हम लेते हुए आयेंगे. उधर हमारे आने के समय ही उस दोस्त को गर्लफ्रेंड से मिलने जाना पड़ गया. उन दिनों जब मोबाईल फोन नहीं थे और हॉस्टल वालों को घर फोन करने के लिए रात 11 बजे का इन्तेजार रहता था कि एसटीडी के रेट आधे हो जायेंगे. तो दोस्त ने हमें इसकी सूचना देनी चाही कि उसे जाना पड़ रहा घर और कमरे की चाबी बाहर बाथरूम में है. आखिर उसने कोड वर्ड निकाला और एक छोटे से कागज पर नक़ल वाली पर्ची जितने छोटे शब्दों में लिखा कि चाबी बाथरूम में है और वह कागज़ दरवाजे के ताले में फंसा दिया....

Friday, March 13, 2009

ओए...हैप्पी होली, होली..होली चला....!!!

होली के दिन आपसी प्यार मोहब्बत का ऐसा नज़ारा पिछले कई सालों बाद देखने को मिला. मेरे मोहल्ले की गुस्सैल महिला मोहल्ले भर के रंग पुते बच्चों को लाइन में खड़ा करके समभाव से उनके मुंह धो रही थी. वह काले-नीले रंग से मुंह पुते बच्चों में से एक को पकड़ती और बड़े जतन से गीले कपड़े से उनका मुंह साफ़ करती. इस प्रेम भाव का रहस्योदघाटन शाम को हुआ जब वह मोहल्ले भर के बच्चों को गालियाँ दे रही थी और यह शिकायत भी कर रही थी कि उसे अपने बच्चे को पहचानने के लिए मोहल्ले भर के बच्चों का मुंह धोना पड़ गया।
खैर, होली के न तो अब रंग कि ऐसे रहे और न ही प्यार. अब मोहल्लों में भी विज्ञापन वाली होली मनायी जाने लगी है. लोग-बाग़ होली के लिए खास तौर पर सफ़ेद कपड़े बनवाते हैं. इसका एहसास भी मुझे अपने मोहल्ले की आंटी से हुआ जो फैशन डिजाईन का कोर्स करने वाली उनकी बेटी के सफ़ेद सूट को लेकर उतावली थी और मोहल्ले में ही सिलाई का काम करने वाली एक अन्य औरत से उलझ रही थी. कारण यह कि उसकी मॉडल बेटी ने कॉलेज के दोस्तों के साथ होली खेलने जाना था, जिसके लिए उसे सफ़ेद सूट चाहिए था. पता नहीं सिलसिला फिल्म में रेखा ने रंग बरसे वाले गाने में सफ़ेद सूट क्यों पहन लिया था. यह बात भी जानना रोचक होगा कि मोहतरमा जब शाम को होली खेल कर वापस आयी तो उनके होली खेले जाने का सबूत सिर्फ उनके चेहरे पर लगे तीन रंग के तिलक थे. उसके सफ़ेद सूट की क्रीज़ भी ख़राब नहीं हुयी थी. पता चला एक अखबार वालों की मुहिम पर चलकर कॉलेज में तिलक होली मनाई गयी थी, जिसमें एक दूसरे को सिर्फ तिलक लगाया गया था और वह भी सूट के रंग और चेहरे की रंगत को मैच करता हुआ।
मुझे अपने बचपन की होली याद आ गयी,जब हम होली से कई दिन पहले से ही स्कूल के बसते में रंग का पैकेट डालकर स्कूल ले जाते थे और छुट्टी के मौका पाकर एक दूसरे को लगा देते थे. यह बात और है कि होली से कई दिन पहले ही कपड़े रंगीन करने शुरू कर देने के कारण घर में जो पिटाई होती थी, उसका रंग भी और ही होता था. वह दिन भी मुझे याद है जब होली के दिन पक्का रंग बनाने के चक्कर में मेरा दोस्त लखन सिंह कई एक्सपेरिमेंट करता था और ऐसा रंग बनाता था कि कई दिन तक घिस-घिसकर उतारने के बाद भी कान और गर्दन पर लगा रह ही जाता था. पूरे मोहल्ले के बच्चे शाम तक रंगों में चेहरे रंगकर जब शाम को मैदान में क्रिकेट खेलते थे तो शक्लें ऐसी होती थी कि एक दूसरे को भी नहीं पहचान पाते थे. अगले दिन स्कूल में हमारे मोहल्ले के बच्चों का रंग अलग ही नज़र आता था।
तब एक चीज़ और थी. तब पिचकारियाँ सीधी-सादी हुआ करती थी. स्पाइडरमैन जैसे डिजाइन वाली नहीं. अब तो पीठ पर पानी का टैंक बांधकर पानी फेंकने वाली पिचकारियाँ भी आ गयी हैं. और रंग भी अजीब से नामों वाले. पहले गिनती के रंग हुआ करते थे. लाल, पीला और हरा. अब पर्पल, मजेंटा....
रंग से मुझे याद आया कि मेरा चार साल का बेटा इस होली को लेकर उत्साहित था, क्योंकि उसे शायद पहली बार पता लग रहा था कि होली के दिन बालकनी में खड़े होकर किसी पर भी पानी फेंका जा सकता है और और ऐसा करने से डांट नहीं पड़ती. और यह भी कि किसी को भी रंगा जा सकता है. उसने मुझसे रंग दिलाने को कहा. मैंने उससे कहा कि मैं उसे नीला रंग दिला दूंगा. लेकिन उसने तीन रंगों कि मांग की. नीला, वनीला और चाकलेट...!!!
और अंत में हमारे एक अंकल की बात भी....सुबह-सुबह मोहल्ले से अंकल की आवाज़ आयी. हैप्पी होली..हैप्पी होली....मैं हैरान कि अंकल ने सुबह-सुबह किसके साथ होली खेलना शुरू कर दिया. बाहर निकल कर देखा तो अंकल मोटरसाईकल पर तेज रफ़्तार से जाने वाले उनके बेटे को होली-होली (धीरे-धीरे) जाने को कह रहे थे...ओये हैप्पी होली...हैप्पी होली....!!!!

Saturday, March 7, 2009

प्रेम की नगरी में कुछ हमरा भी हक होईबे करी....

प्रेम करने का मतलब होता है, जेहाद करने वालों की जमात में शामिल होना। और इधर पिछले कुछ वक़्त से मैं देख रहा हूँ की जेहादियों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। इसका पुख्ता सबूत मुझे मिला पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट से, जहाँ जेहादियों की कतार में खड़े होने वाले लड़के-लड़कियां ज़माने से ज़्यादा अपने घरवालों के डर से भाग कर अदालत की शरण में आते हैं और गुहार लगाते हैं कि उन्हें प्रेम करने के आरोप में क़त्ल कर दिए जाने से बचाया जाए।
पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में साल करीब पाँच हज़ार ऐसे जेहादी आते हैं और अदालतों से गुहार लगाते हैं कि उनके मां-बाप को रोका जाए उनकी जिंदगी में टोका टाकी करने से। अदालत उनके इलाके के पुलिस वालों को आर्डर करती है कि प्रेम करने वालों को कुछ न कहा जाए। अब अदालत ने एक कमेटी बना दी है ताकि घर से भागकर शादी करने वाले इन जेहादियों के लिए एक सिस्टम बनाया जा सके। कमेटी के एक मेंबर हैं राजीव गोदारा। गोदारा कहते हैं कि समस्या समाज की सोच बदलने की है। उनका कहना है की प्रेम विवाह करने को व्यक्तिगत आज़ादी के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए न कि सामाजिक नियमो के प्रति विद्रोह के रूप में। वैसे वे एक सवाल यह भी करते हैं कि शादी करने या न करने को भी कानूनी या सामाजिक जामा क्यों पहनाया जाना जरूरी है? अगर दो व्यस्क उनकी मर्ज़ी से साथ रहना चाहते हैं तो उसमे तंत्र या समाज की मंजूरी लेना जरूरी क्यों हो? ख़ुद की खुशी के लिए किसी से मंजूरी लेना संविधान की मूलभूत अवधारणा का उल्लंघन है।
खैर, मुद्दा यह है कि प्रेम करने वालों को आराम से जीने क्यों नहीं दिया जाता. प्रेम करने वालों कि जान के दुश्मन लोग क्यों हो रहे हैं, यह समझना मुश्किल हो रहा है. चलो माँ-बाप कि तो समझ आती है कि उन्हें अपने बच्चे जायदाद लगते हैं और उनपर हक समझना माँ-बाप का हक होता है. और यह भी कि माँ-बाप चाहे कितने भी आधुनिक हो, वे समझते हैं कि उनके बच्चे हमेशा प्यारे से नन्हे-मुन्ने हैं और उन्हें अभी दुनियादारी का नहीं पता.लेकिन ये बात मेरी समझ से परे हो रही है कि हरियाणा में खाप के नाम पर धर्म और समाज कि ठेकेदारी करने वालों को किसी से क्या लेना देना है? यह लगभग वैसा ही है जैसे कॉलेज में नए नए दाखिल होने वाले लड़के करते हैं. जिस लड़की पर फ़िदा हो गए, वो सबसे शरीफ लड़की होती है, बशर्ते कि वह लड़की सिर्फ और सिर्फ उसी लड़के के प्रस्ताव को हाँ करे. अगर उसे हाँ नहीं करे तो किसीको नहीं हाँ न करे. और अगर किसी और लड़के को हाँ कर दे उस से बदचलन लड़की और कोई नहीं...!!
ऐसा ही व्यवहार खाप पंचायतों के ठेकेदार कर रहे हैं कि लड़की या तो हमारी मर्ज़ी वाले लड़के से शादी करेगी नहीं तो दुनिया भर के लड़के उसके भाई बनेंगे. आप देख लीजिये हरियाणा में येही हुआ. अपनी मर्ज़ी से शादी करने यानी प्रेम विवाह करके अपना घर बसा लेने वाली लड़की को समाज के ठेकेदारों ने भाई-बहन बनने के लिए डराया- धमकाया और गाँव से निकल दिया. पूछे कोई इन बंद दिमाग वालों से कि शादी करके एक बच्चा पैदा करके कोई लड़की कैसे अपने शौहर को भाई मान लेगी? वोह मरना पसंद करेगी ऐसी जलालत से. मनोज और बबली कांड में तो ऐसा ही हुआ. दोनों को जान से हाथ धोना पड़ा. पता नहीं कब समझेंगे लोग कि एक ही जनम मिला है जीने के लिए. प्यार से जियो. उम्र इतनी है ही कहाँ कि नफरत के लिए वक़्त मिले?? रोहतक में जगमती सांगवान नाम की जुझारू महिला हैं. प्रेम विवाह करने वालों की तरफ खड़ी हैं. सुबह निकलती हैं और घूम घूमकर समाज के ठेकेदारों की बंद अक्ल को खोलने के काम में जुटी रहती हैं.. अमेरिका में बसी पत्रकार रमा श्रीनिवासन ने भी इस मामले में अपने सुझाव भेजे हैं. वे तो यह कहती हैं की हरियाणा में प्रेम विवाह करने वालों के खिलाफ दर्ज होने वाले मामलों की सुनवायी हरियाणा में होनी ही नहीं चाहिए क्योंकि पुलिस वाले भी उसी सामाजिक सोच के हैं. ऐसे सुझावों पर गौर करना जरूरी है क्योंकि युवा वर्ग को दबा कर रखना किसी चिंगारी को दबाये रखने जैसा ही होता है...अच्छा है युवा वर्ग अपनी जिम्मेदारी को अपने सर लेने की जिद कर रहा है. आईये उन्हें भी समाज में उनका हक दे दें. और वे मांग भी क्या रहे हैं? प्रेम करने का हक. क्या उनका इतना भी हक नहीं है समाज पर??

Monday, February 23, 2009

लंगोट वालों के लिए (पिंक) चड्डी.....!!! हाय राम...!!!

दिन भर वैलेंटाइन दिवस मनाने और उन्हें ऐसा करने से रोकने के लिए हाथ धोकर पीछे पड़े सेनापतिओं, दलियों और परिषादियों के कारनामों की खबरें पढ़ता रहा. मुझे दो बातें बिल्कुल भी समझ में नहीं आ रही, पहली यह कि इन्हें धरम कि ठेकेदारी करने का लाईसेन्स कौन देता है? और दूसरी बात यह कि अपनी औरतों और दूसरों की बहनों-बेटियों के साथ बदतमीजी करना क्या ये लोग माँ के गर्भ से सीखकर आते हैं या यहाँ हिन्दुस्तान में भी तालिबानिओं ने अपनी फ्रैन्चाईजी दे दी हैं ट्रेनिंग कैंप चलाने की. या राज चलाने वालों की नीतियां ही ऐसी हैं...? मंगलोर में जो हुआ उसे तो सरकारी नीति ही कहा जा सकता है क्योंकि राज चलाने वालों ने उसके ख़िलाफ़ कुछ नहीं बोला. पब में बैठी लड़किओं के साथ जो हुआ वह भी तो संस्कृति नहीं है. देश के एक एक पैसे पर, नोट पर महात्मा गाँधी की फोटो लगी है...और उनके अहिंसा के नारे को हम याद तक नहीं रख रहे. वैसे मतलब तो यह भी नहीं है की पब भरो आन्दोलनों से ही नारी आजादी आने वाली है. रेणुका चौधरी के बयान पर भी मैं हैरान हुआ, असल में वे मोहतरमा भी इस मुगालते में हैं कि पब में जाने, अधनंगे बदन रखने से ही औरतें आजाद होंगी. आज़ादी का मतलब सोच की आज़ादी से है कि वे कितनी आज़ादी से सोच सकती हैं. और सोच पब से नहीं बल्कि बुद्धिजीविता से आती है. पब में बैठने से सिर्फ़ बिंदास दिखा जा सकता है, बना नहीं जा सकता. बिंदास होने के लिए उस स्तर तक आना पड़ेगा जहाँ से एक तर्कसंगत सोच शुरू होती है. हमारे मुथालिक को भी मारपीट कर संस्कृति सिखाने की कोशिश छोड़कर पब में बैठने वाली लड़कियों को अमृता प्रीतम जैसी बिंदास बनने के बारे में बताना चाहिए जिसने आज से कई साल पहले बिना शादी किए इमरोज़ के साथ रहने का मादा दुनिया को दिखाया. यह मादा तभी आएगा जब सोच बदलेगी. मेरे एक दोस्त राजीव गोदारा की बात याद आ गयी जो सोच बदलने का जबरदस्त उदाहरण है. राजीव गोदारा पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट में वकील हैं. प्रेम विवाह करके माँ-बाप और समाज से सुरक्षा लेने के लिए हाई कोर्ट में आने वाली उन लड़कियों की बात की राजीव ने. राजीव का तर्क है की लड़कियां विवाह के लिए समाज के पित्रात्मक नियमों को ठुकरा रही हैं यह अच्छी बात है. पर उनकी सोच स्वतंत्र नहीं हो रही. क्योंकि वे समाज के नियम तोड़कर शादी कर रही हैं, लेकिन दुल्हन के लिए हाथ में कुहनी तक चूडा पहनने वाली शर्त से बाहर नहीं निकल पा रही हैं. अगर वे विवाह को संस्था के तौर पर ठुकरा रही हैं तो वे जींस पहनकर शादी क्यों नहीं करती....!!! ये ही सोच का फर्क है..जो आना चाहिए. बात मैं उन की कर रहा हूँ जिनके राज में यह सब हो रहा है. पता नहीं राज को धरम बताने वाले इंसानियत का धरम कब सीखेंगे. सब को थोड़ा टाईट करने की जरूरत है. टाईट किए बिना कुछ होने वाला नहीं है. चंडीगढ़ के नजदीक लगते हरियाणा के शहर पंचकुला में कानून और व्यवस्था की हालत ख़राब हो गयी. तीन साल में 17 डकैतियां और 18 कत्ल. डीजीपी साहब से पूछा की जनाब, एसपी ने तो कुछ नहीं किया, आपने क्या किया? डीजीपी साहब बोले-मैंने एसपी को थोड़ा टाईट कर दिया है. अगर टाईट करने से सब कुछ ठीक हो सकता है तो राज चलाने वाले इन राम सेना वालों, बजरंग दल वालों और विश्व हिन्दू परिषद् वालों को क्यों नहीं टाइट कर रही? जनता को ही टाइट किए जा रहे हैं. चंडीगढ़ में पिछले हफ्ते इंडियन नेशनल लोकदल नाम की पार्टी ने एक राजनैतिक रैली की. रैली का आयोजन हरियाणा में क़ानून और व्यवस्था ख़राब होने के कारण कांग्रेस सरकार को टाईट करना था. लेकिन जिस तरह से सारी कानून व्यवस्था को धत्ता बता कर रैली करने वालों ने चंडीगढ़ शहर के बाशिंदों को टाईट किया, वो ही जानते हैं. एक बुजुर्ग ने तो शुक्र मनाया की रैली करने वाले सत्ता में नहीं हैं, नहीं तो कानून व्यवस्था का क्या हाल करते ये सबके सामने ही है. बात जब टाईट करने की ही चल पड़ी है तो यह भी बता देता हूँ कि मुथालिक जैसे लोगों को लड़कियों के टाईट कपड़े पहनने पर पहले ही ऐतराज़ है और ऊपर से इन पिंक चड्डी वालियों ने समस्या गंभीर कर दी. पच्चीस हज़ार चड्डी भेज तो दी मुथालिक को पर उसे सारी टाईट हैं. कोई भी उसके साइज़ नहीं है. मुथालिक ने समझदारी दिखाई कि साडियां भेज दी. साइज़ का कोई चक्कर नहीं. कोई भी पहन ले. शुक्र है निशा सरूर ने 'पब जाने वाली, लूज़ और फॉरवर्ड लड़कियों' से मुथालिक के लिए बिकनी वाली चड्डी भेजने का आह्वान नहीं कर दिया. राम राम...!!! क्या ज़माना आ गया है. एक ज़माना था लडकियां घरों में भी अपनी चड्डी बड़े कपडों के नीचे छुपा कर सुखाया करती थी किसी कोने में और अब पार्सल कर रही हैं...?? मुझे याद आया कि किसी ने मुझे एक बार समझाया था कि समझदार वही होता है जो दूसरों के फेंके पत्थरों से अपने लिए मकान बना ले.. तो समझदारी इसी में हैं कि मुथालिक इन चड्डी की दूकान खोल लें. गांधीगिरी का इस से अच्छा तरीका नहीं हो सकता. वैसे एक बात मुझे समझ नहीं आ रही कि औरत जात से नफरत करने वालों के इन सभी गैंग वालों ने अपने नाम भगवान पर क्यों रखे हैं? सतयुग में तो किसी भगवन ने ऐसा नहीं किया. राम सेना वाले जिस संस्कृति की बात कर रहे हैं वे अगर रामायण में छपी माता सीता की फोटो देख लें तो उन्हें अकल आ जाए. उस ज़माने में औरतों के पहनावे के बारे में लिखा गया है कि वे साड़ी और कंचुकी पहनती थी. लड़कियों के जींस और टॉप पहनने पर ऐतराज़ करने वाले जान लें कि कंचुकी बिकनी से भी छोटा अंग वस्त्र होता है. भगवान के किसी भी अवतार ने औरतों के कपडों के तरीके पर तो ऐतराज़ नहीं किया. सीता हरण के बाद जंगल से मिले जेवर जब भगवान राम ने बजरंग बली को दिखाए और पूछा कि हनुमान, क्या तुम सीता के जेवर पहचानते हो? तो बजरंग बली ने कहा प्रभु, मैंने तो माता सीता के पैरों को ही देखा है, पैरों में पहनने वाला कोई जेवर हो तो पहचान लूँगा. हैरानी है कि बजरंग बली के नाम पर बनी बजरंग दल वाले लड़कियों के सारे बदन को जांच लेते हैं कि उसने ऊपर क्या पहना है और नीचे क्या? इन्हें भी टाईट किए जाने कि जरूरत है..लड़कियां ही करेंगी किसी दिन इन गुंडा राज चलाने वालों को टाईट. टाईट जींस के नीचे जो हील वाले टाईट जूते हैं न, वह ही राज चलाने वालो को भी ठीक करेंगे...one tight slap and MTV bolti band..!!! मुझे एक दोस्त की बात याद आ गयी जो कहता है कि जो जिस जुबान में समझता हो, उसे उसी जुबां में समझाना चाहिए, इस लिए इन राम सेना और बजरंग दल वालों को आजकल की भाषा में रामायण समझानी चाहिए....उदाहरण लीजिये....श्री राम के वनवास जाने के बाद जब भरत अयोध्या लौटे तो पाया की भाई साहब तो जंगल में चले गए हैं रहने..वे राम जी को मनाकर लाने गए. भरत बोले-भाई साहब, आप वापस चलिए, राम जी बोले-भरत, तुम जाओ, और राज करो...और सुनो, यह मेरे जूते ले जाओ. क्योंकि आज कल जूते के बिना 'राज' नहीं चलता....!!! (नोट: कृपा ध्यान दें, भगवान् राम जी का इशारा 'राज' ठाकरे की तरफ़ नहीं था...!!!)

आओ, करोड़पति कुत्ते का नाम बदलें....!!!

दोस्तों, चंडीगढ़ में कल कुत्ता-प्रदर्शनी यानी 'डॉग-शो' लगी थी. कई नस्ल और किस्म के कुत्ते आए थे हिस्सा लेने क लिए. लेकिन सब में एक बात समान थी और वो यह कि उनमें से कोई भी 'स्लमडॉग' नहीं था और उन सभी के मालिक 'करोड़पति' थे. एक कुत्ता तो ऐसा भी था जिसकी कीमत साथ लाख बताई गयी जो लगभग करोड़ रुपये के करीब है. जाहिर हैं कुत्ते को चुरा ले जाने वाला भी करोड़पति बन जायेगा. खैर, मॉडल और एक्टर गुल पनाग भी वहां आई हुई थी. जिस बात ने मेरा ध्यान खींचा वह था उसके कुत्ते का नाम ऑस्कर है. ऑस्कर से मुझे तुरन्त याद आया कि हमारे यहाँ की झुग्गी-बस्ती का एक कुत्ता इन दिनों करोड़पति बन गया है और 'ऑस्कर' पुरस्कार में भी सबसे आगे पहुँच गया है. इसमें क्या बड़ी बात है? हमारे यहाँ तो कुत्तों के नाम ही ऑस्कर हैं...!! नाम से याद आया कि पिछले दिनों एक बड़ा विवाद यह भी सुर्खियों में रहा कि आमिर खान के कुत्ते का नाम शाहरुख़ खान है. इसका मतलब आमिर साहब भी टॉप लेवल के कुत्तों के शौकीन हैं. नाम बड़ी चीज़ है. स्लम डॉग मिलिनेयर फ़िल्म ने हिंदुस्तान का नाम ऑस्कर तक पहुँचा दिया और लोग हैं कि झुग्गी-बस्ती के कुत्तों के नाम खराब करने का रोना रो रहे हैं. मुंबई झुग्गी बस्ती में रहने वालों ने मोर्चा खोल दिया कि फ़िल्म ने उनकी इज्ज़त मिट्टी में मिला दी. झुग्गी बस्ती के कुत्ते भी अब उनकी इज्ज़त नहीं करते. उन्होंने मांग कि कि फ़िल्म का नाम बदलो. नहीं हुआ. ऑस्कर पाने वालों ने कहा-अज्जी, छोडो भी. कुत्ते तो भोंकते रहते हैं. आप गाना सुनिए. इनका क्या है? कल को बोलेंगे एचऍमवी का निशान बदल दो..उसमें भी कुत्ता बैठा है ग्रामोफोन के सामने. कुत्ते का नाम बदलने से ही यह भी याद आया कि मेरा एक दोस्त था सर्वमीत सिंह. पत्रकार था. स्पष्टवादी और बेबाक. . सभी अच्छे लोगों कि तरह वह भी जल्दी चला गया इस दुनिया से. एक बार उसने मुझे बताया कि रात को खाना खाने के बाद जब वह सैर करने निकला तो उसे एक महिला मिली जो अपने तीन साल के बच्चे को घुमा रही थी. बच्चे ने गली के एक कुत्ते को देखा और बोला- मम्मी, देखो कुत्ता..!! महिला बोली-नो, बेटा वो डोग्गी है. बच्चे ने फ़िर अपनी भाषा में बोलने कि जिद की कि- मम्मी, वो कुत्ता है. महिला नहीं चाहती थी कि उसका बेटा कुत्ते को कुत्ता कहे. सर्वमीत से रहा नहीं गया. बच्चे से बोला-बेटा, तू मुझे कुत्ता कह ले, पर उसको डोग्गी ही बोल दे. अब यह बताने कि जरूरत नहीं कि महिला ने सरदार जी के साथ क्या किया होगा. खैर, नाम और बदलने कि मांग से जुड़ी एक ख़बर ने हमारे शौकत मियाँ को काफ़ी तकलीफ दी है. सलून वालों ने 'बिल्लू बारबर' फ़िल्म का नाम बदलने कि मांग रख दी. और हैरानी तो यह है कि नाम तुंरत ही बदल दिया गया. और तो और शाहरुख़ खान ने माफ़ी भी मांग ली. उन्हें पता है ये कोई साधारण नाई नहीं हैं. पेज 3 पर छपने वाले लोग हैं. अंग्रेज़ी बोलने वाले, सिल्विया जैसे, लन्दन से बाल काटने कि ट्रेनिंग लेकर आने वाले. दो दिन के लिए भी हड़ताल पर चले गए तो पेज 3 की सारी पार्टियों का भट्ठा बैठ जाएगा. शौकत मियाँ का कहना है-मिया, हमें चालीस साल हो गए लोगों की हजामत बनाते हुए. रहे फ़िर भी नाई के नाई. एक मौका मिल रहा था नाई से बारबर बनने का..साले, वो भी ले गए. नाम की महिमा के बारे में मैं ज्यादा नहीं कहूँगा. सिर्फ़ उतनी बात जो मेरे इर्द-गिर्द हो रही है. ऋतू चौधरी के महिमा बनने की कहानी कहने पर गया तो युसूफ साहब से दिलीप कुमार बनने और ऐ.आर. दिलीप कुमार से ऐ.आर. रहमान बनने और करोड़पतियों के कुत्तों का नाम ऑस्कर रखे जाने की बात भी कहनी पड़ेगी. मैं एक ऐसे परिवार की बात जरूर करूँगा जिन्होंने अपनी बेटी का नाम इतना सटीक रखा है कि हैरानी होती है. अंकल जी पंजाब से हैं और आंटी जी हरियाणा से. घर में बेटी हुई तो नाम सोचा जाने लगा. फ़िर दोनों ने मिलकर नाम रखा 'परियाना'-पंजाब और हरियाणा को मिलाकर. अंकल ने दोनों राज्यों को मिला दिया और आंटी ने इसका मतलब निकाला-परी का आना. शायद हमारे पॉलिटिकल लीडर और लड़कियों को गर्भ में मार देने वाले भी सबक ले लें परियाना से. नाम रखने और बदल लेने का भी रिवाज़ आजकल चल रहा है. लोग तो मानते हैं कि इसकी शुरुआत करीना कपूर कि बहन करिश्मा कपूर ने कि थी जिसने अपना नाम बदल कर मोटर सायिकल जैसा कर लिया था-करिज्मा..!! उसके बाद बॉलीवुड में फैशन चल पड़ा. मुझे याद आता है करीब बीस साल पहले मैंने किसी के घर के आगे लगी नेम प्लेट देखि थी जिसमे kapoor की जगह capoor लिखा था. मैं कई साल तक सोचता रहा की शायद स्पेलिंग ग़लत हो गए है. अब हालत ऐसे हैं कि किसी ने दो 'ऐ' लगा लिए हैं किसी ने दो 'बी'. मेरे दोस्त आदित्य के ऑफिस में काम करने वाली एक लड़की ने अपने नाम प्रियंका में 'एच' लगा लिया है. उसे विश्वास है कि उसका नया नाम करिज्मा करेगा. देखते हैं. बाकी, एक बात और बता देता हूँ जो मुझे अभी अभी याद आई है. मुझे जानने वाले एक सज्जन ने बताया कि उसने तीन कुत्ते पाल रखे हैं, जबकि उसके पिता कहते हैं कि उनके घर में चार कुत्ते हैं. शेरू, टॉमी, बाक्सर के अलावा चौथा कौन??? चौथा जोनी-यानी मैं...!!! मुझे नाम बदल लेना चाहिए यार..! कोई जानता है क्या नुमेरोलोजिस्ट???