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Sunday, September 5, 2010

मेरी बंदगी क़बूल करने को कोई खुदा नहीं उठता ..!!

यहाँ के सरकारी अस्पताल के गायनी वार्ड के बाहर पर्ची बनवाने की लाइन में खड़ी मजदूर औरत बुलबुल के वहीँ खड़े-खड़े एक बच्ची के जन्म देने और नीचे फर्श पर सर के बल गिरी बच्ची की मौत की जांच होने को लेकर कुछ तस्सली हुई कि शुक्र है एक बच्ची की जान की कीमत किसी ने तो आंकने की कोशिश की..और वह भी एक गरीब मजदूर औरत की बच्ची.
लेकिन, वहां बुलंदशहर के पास के उस कसबे के अस्पताल में पैदा हुयी उस बच्ची की मौत पर किसी ने मातम नहीं मनाया जिसे बचाने की कोशिश में उस गायनी डाक्टर ने लेबर रूम में कड़ी मशक्कत की. उस मासूम बच्ची ने लाजिमी तौर पर आदम जात लोगों से यह उम्मीद तो की ही होगी कि उसे उसकी माँ के सीने से लगने का एक मौका तो दिया ही जायेगा....पर शायद उसकी माँ के साथ अस्पताल आयी उस औरत जात इंसान को शायद यह मंज़ूर नहीं था कि उसके घर में एक लड़की आये जो बड़ी होकर उसकी ही तरह दुःख तकलीफ पाए....नौ महीने तक उसे लिए घूमने और उसे जनम देने वाली का क्या....भूल जायेगी और तीन महीने में.
मैं उसे नहीं जानता था, उसकी माँ 22 साल की पूजा को भी नहीं !! प्राईमी, हिमोलिटिक अनीमिया, अज्मैटिक !!...मुझे जब लेबर रूम से कॉल आयी तो मैं उससे मिला...'डिस्ट्रेस' में थी. 'मिकोनियम' पास कर दिया था...हुयी तो नोर्मल डिलीवरी से ही पर मैंने देखा कि बच्ची को इन्टेंसिव केअर की जरूरत थी. गायनेकोलोजिस्ट से सलाह के बाद मैंने उसके अटेंडेंट को उसे बुलंद शहर ले जाने की सलाह दी.
सुबह खबर आयी कि बच्ची बच नहीं पायी...मुझे कुछ हैरानी हुयी, इसलिए कि बच्ची डिस्ट्रेस में जरूर थी लेकिन इतनी क्रिटिकल भी नहीं थी. बाद में स्टाफ ने बताया कि बच्ची को गाडी में ले जाते हुए तो देखा था, और यह भी कि बच्ची की 'बेचारी' दादी बच्ची को चम्मच से दूध पिलाने की कोशिश भी कर रही थी...!! मैं केस समझ चुका था..!! वार्ड में राउंड के दौरान मैंने पूजा को बेबसी भरी आँखों से लेबर रूम की तरफ टकटकी लगाकर देखते हुए पाया. इस उम्मीद में कि शायद उधर से कोई मासूम सी किलकारी सुन जाए..!! पर अफ़सोस..!!
और डाक्टर अनुराग, पता नहीं क्यों मुझे आपकी याद बहुत आयी जब पूजा को डिस्चार्ज करवाकर ले जा रही उसकी सास ने अपनी बेटी की मौत का मातम मना रही एक माँ के आंसूओं को ड्रामा बता कर उसे डांट दिया...लेबर रूम से किसी आवाज़ सुन जाने की आखिरी उम्मीद पर पीछे मुड़-मुड़कर देखती पूजा को मैं उस वक़्त भागकर पकड़ने से खुद को रोक नहीं पाया जब मैंने देखा, उसके परिवार के लोग उसे वहीँ सड़क किनारे छोड़कर गाडी भगा ले गए...धूल के गुब्बार में अज्मैटिक अटैक का शिकार होकर बेदम होती एक और माँ..!!

Saturday, April 24, 2010

चुप रहेगी अगर जुबान-ऐ-खंजर, लहू पुकारेगा आस्तीन का...

पीएमटी एक्साम देकर सेंटर से बाहर निकलते ही डीएवी कल कोलेज के बाहर एक पेड़ के नीचे खड़े कुछ लोगों का वह खुसर-पुसर करता झुण्ड मुझे अब तक याद है..एक बड़ी सी गाड़ी के आसपास एक सांवले और मोटे से आदमी से कुछ बच्चों के मां-बाप पैसों के बारे में बात कर रहे थे. वह आदमी बदले में अपना विजिटिंग कार्ड दे रहा था. बाद में पता चला कि वह कर्नाटका के एक प्राईवेट मेडिकल कोलेज का एजेंट था. उन दिनों वह मेडिकल कोलेज में दाखिले के आठ लाख मांग रहा था. चूँकि उन दिनों यह प्राईवेट मेडिकल कोलेज खोलने का धंधा इधर उत्तर भारत के पैसे वालों और नेताओं को नहीं सूझा था. सो हमारे यहाँ चंडीगढ़ और पंजाब के अधिकतर बच्चे कर्नाटका के मेडिकल और इंजिनीयरिंग कोलेजों में ही जाते थे. वहीँ फीस कुछ कम थी. उसके कुछ दिनों बाद चंडीगढ़ के अखबारों में रशिया में मास्को से एमबीबीएस में दाखिले के विज्ञापन भी बहुत छपे. मेरे भी दो दोस्त मास्को गए.
हमारे पास न तो पैसा था और न ही मां-बाप में मुझे विदेश भेजने के लिए जोड़-जुगाड़ का मादा. पर भगवान् की मेहरबानी ही कहूँगा कि पीएमटी के पहले ही अटेम्प्ट में तुक्का लग गया और दाखिला हो गया, नहीं तो....!!
इसीलिए कल जब अखबार में मेडिकल काउन्सिल के चीफ केतन देसाई की गिरफ्तारी की खबर पढ़ी, मुझे कोई ख़ास हैरानी नहीं हुयी. हैरानी इस बात पर हुयी कि इतने साल बाद यह ड्रामा क्यों? क्या इसमें भी वही रटा-रटाया तर्क है कि किसको हिस्सा नहीं पहुंचा जो केतन देसी को पकडवा दिया? यह बात देश भर के सारे डॉक्टर, उनके मां-बाप, देश भर में चल रहे मेडिकल कोलेज और सरकार भी जानती है कि देश भर के प्राईवेट मेडिकल कोलेजों में लाखों रुपये कपिटेशन फीस ली जाती है, और सरेआम ली जाती है, तो यह कैसे हो सकता है कि प्राईवेट मेडिकल कोलेजों को परमिशन बिना कुछ लिए-दिए मिल जाती होगी? केतन देसाई ने दो हज़ार करोड़ रूपये ऐसे ही तो इकट्ठे नहीं किये? यह ज्ञान सागर मेडिकल कोलेज वाले दो करोड़ रूपये लेकर केतन देसाई के पास पीजी कोर्स चालने की परमिशन लेने ही गए थे. यह मेडिकल कोलेज चंडीगढ़ के नजदीक ही है, पटियाला जाते समय बाहर से बिल्डिंग देखने का मौका भी मिला, पता नहीं इतना पैसा कहाँ से लगा रखा है?? पूरा तो हो ही जाना है. पंजाब के लगभग सभी पोलिटिकल लोगों ने मेडिकल कोलेज, इंजिनीयरिंग और मैनेजमेंट कोलेज खोल लिए हैं. पहले कहते थे कि साउथ वाले पोलिटिशियन धंधे के लिए या तो मंदिर खोलते हैं या मेडिकल और इंजीनियरिंग कोलेज. अब हमारे इलाके के सारे सरदारों ने या तो मेडिकल, नर्सिंग और एमबीऐ के कोलिज खोल लिए हैं या फिर प्रोपर्टी डीलर के दफ्तर.,
केंद्रीय हेल्थ मिनिस्टर रहे डाक्टर अम्बु मणि रामदोस से एक बार मिलने का मौका मिला था, तो मैंने उनसे देश में डाक्टरों की कमी और करीब दो लाख ऐसे डाक्टरों के मुद्दे पर बात की थी जिन्होंने विदेश से एमबीबीएस की है, लेकिन मेडिकल काउन्सिल ऑफ़ इंडिया ने उन्हें रजिस्ट्रेशन देने के लिए टेस्ट रखा हुआ है. उनका जवाब था , 'आई विल सी इट'. अबके हेल्थ मिनिस्टर गुलाम नबी आज़ाद भी येही कहते फिर रहे हैं कि देश में डाक्टरों की कमी पूरी करने के लिए पीजी सीटें बढ़ा रहे हैं. उन्हें कोई बता दे कि दिल्ली के युसूफ सराय इलाके के पीछे गौतम नगर है, जहाँ रशिया से एमबीबीएस करके आये हज़ारों युवा डाक्टर पेईंग गेस्ट रह रहे हैं. दिल्ली के प्राईवेट नर्सिंग होम में सिर्फ दस-दस हज़ार रूपये में आरएमओ लगे हैं. रात को ड्यूटी करते हैं, दिन में मेडिकल काउन्सिल के 'ऍफ़एमजीई' के टेस्ट की कोचिंग लेते हैं. साल में दो बार होने वाले इस टेस्ट में कई हज़ार डाक्टर हिस्सा लेते हैं और पास होते हैं सिर्फ आठ से नौ परसेंट.
यह बात भी मुझे किसी ख़ास ने बतायी कि प्राईवेट मेडिकल कालेजों की लोबी के चलते मेडिकल काउन्सिल ने यह टेस्ट इतना मुश्किल रखा है कि ऐमस से एमडी कर चुके किसी डाक्टर से भी पास न हो सके. येही कारण है कि यहाँ की मेडिकल कोलेज लोबी विदेशों से डिग्री लेने वालों की बजाये यहाँ दाखिला लेने को मजबूर कर रही है ताकि कैपिटेशन फीस मिले. केतन देसाई की गिरफ्तारी से यह पहलू भी साफ हो गया है.
सरकार को अब शायद यह समझ आ जाये कि इन डाक्टरों को रजिस्ट्रेशन देने में मेडिकल काउन्सिल में हो रही धांधली को रोक कर वह गावों में डाक्टरों के कमी पूरी कर सके.

Saturday, February 27, 2010

अब दुआ अर्श पे जाती है असर लाने को...!!

कल ही मेरी नज़र उस पर पड़ी. हालांकि इस इलाके के बाकी सभी लोगों की तरह मेरे आने-जाने का रास्ता भी वही एक है, लेकिन दिनभर का रूटीन दिमाग में लेकर सुबह काम पर भागने की जल्दी में मैंने उसकी और ध्यान नहीं दिया और रात देर गए लौटने के समय तक वह जा चुका होता है. लेकिन शनिवार की सुबह जब बेटे को स्कूल छोड़ने निकला तो मैंने उसे देखा. घरों के इस तरफ के ब्लोक से बाहर निकलने और मेन सड़क मिलने के मोड़ पर पार्क के कोने में वह खड़ा था. नीचे जमीन पर छोटी-छोटी शीशियाँ राखी थी जिनमें से एक-आध में कुछ तेलनुमा भरा हुआ नज़र आ रहा था. और पीछे पार्क की रेलिंग पर उसने एक बैनर बाँध रखा था जिसपर 'तेल मालिश, जोड़ों के दर्द का इलाज़' लिखा हुआ था.
ध्यान उसपर इस लिए नहीं गया कि शहर भर में जगह जगह खुले फिजियोथेरेपी सेंटरों के रहते हुए भला इसने इतना बड़ा रिस्क कैसे लिया ऐसे बिजनेस का, और वह भी ऐसे इलाके में जहाँ घरों के चार ब्लॉक में अस्पतालों में जान पहचान रखने वाले मुझ समेत तीन डॉक्टर और सरकारी अस्पतालों में काम करने वाली कम से कम चार नर्सें रहती हैं जो पर्ची बनवाने और लाइन में लगने के झंझट से बचाने में कारगर हैं. और यह भी कि जहाँ इस बूढ़े ने यह बिजनेस शुरू किया है, उसके बा-मुश्किल आधा किलोमीटर दो नर्सिंग होम भी हैं जहाँ आर्थोपेडिक डिपार्टमेंट ठीकठाक हैं.
मेरा ध्यान उस साठ साल के बूढ़े की और इसलिए गया क्योंकि एक तो वह मेरे हिसाब से कुछ ज्यादा ही जल्दी काम पर आ गया था. मेरे ख्याल से घुटनों-जोड़ों के दर्द वाले बुजुर्ग अच्छी-खासी धूप निकलने के बाद ही घरों से निकलकर यहाँ सरेआम घुटनों की मालिश कराने आयेंगे...और दूसरी बात यह कि वह बूढा आराम से बैठकर ग्राहकों का इंतज़ार करने की बजाय खड़ा होकर हर आने-जाने वाले को हाथ उठा कर सलाम कर रहा था. पता नहीं क्यों उसका यह तरीका दिमाग में कहीं बैठ गया. सोचा शायद मार्केटिंग का तरीका है कि लोगों की नज़रों में आया जाये और फिर बिजनेस करे.
लेकिन मन माना नहीं. बच्चे को स्कूल छोड़कर जब वापस लौटा तो भी उस बूढ़े को उसी अंदाज में पाया. हर आने-जाने वाले को सलाम करते हुए. ऑफिस के लिए जब निकला उस समय तक सड़क पर भीड़ कम हो चुकी थी. मेरी गाडी को देखते ही उसने फिर उसी अंदाज में सलाम किया तो मैं रह नहीं सका और उसतक जा पहुंचा. मेरा सवाल-यह हर किसी को सलाम करके ग्राहक बनाने का तरीका क्या काम करेगा? जवाब-क्या आपने मेरे पास ग्राहकों की भीड़ देखी? नहीं..!! मैं सलाम नहीं करता..मैं यहाँ से गुजरें वालों के लिए दुआ मांगता हूँ कि उनके हाथ-पाँव सलामत रहें..शाम को सलामती से लौट आयें..जिन बच्चों के पास बुजुर्गों के पाँव दबाने की फुर्सत नहीं है, मैं तो उनके लिए बैठा हूँ...!!
क्या आपके पास है कोई जवाब??
एक और ऐसी ही घटना मुझे याद आयी है. कोई दस साल पहले की बात है. शाम को दिन ढले ऑफिस जाते समय ऑफिस के मोड़ से कुछ पहले पूर्वी दिशा में लगे पोपलर के पेड़ों की ओर मुंह ओर छिपते हुए सूरज की ओर पीठ किये हुए एक गरीब सा दिखने वाला बूढा आसमान की ओर बाहें उठाये कुछ बोल रहा था. पेड़ों से बात करने वाले किसी चरवाहे जैसी किसी कहानी का पात्र. एक महीना लगातार देखने के बाद मुझसे नहीं रहा गया. गाडी ऑफिस में पार्क करके सैर करने के बहाने मैं उसके पास पहुंचा...बूढा सचमुच पेड़ों से बात कर रहा था..'तुम महान हो..हम से बड़े हो..इन बच्चों को सांस लेने लायक साफ़ हवा देते रहना...हर मौसम में, मेरे बाद भी !!!

Thursday, September 3, 2009

कहते तो सही हो, डाक्टर अनुराग...!!!

डाक्टर अनुराग सही कहते हैं, दुखों के जेरोक्स मशीन की वसीयत औरतों के नाम न सही, लेकिन उस वसीयत की एक-एक फोटोकॉपी हरेक औरत के पास है.
बुलंदशहर के पास एक कसबे जेवर में जाना हुआ जहाँ एक दोस्त गायनेकोलोगिस्ट है. हैरानि होती रही दिन भर ओपीडी में बैठे हुए. उम्र 20 साल, नौ महीने का गर्भ, मल्टी ग्राविडा, एचबी सिर्फ 5 ग्राम और इंशाअल्लाह रोजे रखे हुए हैं. डाक्टर कहती है रोजा नहीं रखो, मर जाओगी. साथ आयी सास कहती है-यों न होने का डाक्टर साहिब. साल भहर में एक दफा तो रमदान का महीना आवे है. सालभर खाना ही होवे फिर. सही है, सास-बहु दोनों के पास पक्के तौर पर दुखों के जेरोक्स कापी है.
और यह जो औरत आज दाखिल हुयी है, इसके पास तो वसीयत की रजिस्ट्री भी है. उम्र कोई बीस साल, पेशा मजदूरी. पहला बच्चा, झुग्गी में ही किसी दाईनुमा औरत ने उस वसीयत की कापी इस औरत को भी सौंप कर अपनी जिम्मेदारी पूरी कर दी.
बच्चा तो पैदा करवा दिया पर कुछ हिस्सा भीतर छूट गया जिसे हम मेडिकल वाले रिटेनड प्लेसेंटा कहते हैं. सड़क पर मजदूरी करने वाला शौहर हेवी ब्लीडिंग और कन्वेलसेंस की हालत में लेकर अस्पताल पहुंचा. खुद भी बदहवासी में. मरीज की हालत खुद ही गरीबी बयां कर रही थी और उसके शौहर ही हालत उसक मजबूरी और बेबसी की. उसके पास एक भी पैसा नहं था इलाज़ के लिए. कुछ घंटों पहले पैदा हुयी नन्ही सी जान को हाथों में लिए वह डाक्टर संजना के सामने उस औरत को किसी भी तरह बचा लेने के लिए गिडगिडा रहा था.
ऐसे मरीज भी शायद ऐसे ही कमजोर दिल डाक्टरों का पता भगवान् से ही पूछ कर आते हैं, जो हाथ जोड़कर नीच फर्श पर बैठ जाने वाले गरीब मरीज को देखकर डिग्री लेते हुए खाई 'हिप्पोक्रेटिक ओथ' को हनुमान चालिषा की तरह दोहराने लग जाते हैं.
मै देखता हूँ डाक्टर संजना बेबसी की जुबां पढ़ रही है. जल्दी से ब्लड सैम्पल लिया गया. जांच रिपोर्ट आ गयी है. टायफायड, मलेरिया पाजिटिव और एचबी सिर्फ चार ग्राम. घंटे भर की मेहनत के बाद मरीज़ औरत कुछ शांत लगी. हम लोग ओपीडी के बाद चाय पीने बैठे ही हैं कि फिमेल वार्ड की नर्स भागी आयी-डाक्टर साहिब, पांच नंबर वाली कि पल्स नहीं मिल रही. भागकर गए तब तक मौत बाज़ी ले जा चुकी थी. नन्हीं जान ने मां के शरीर की छुअन भी नहीं महसूस की थी और मां बच्ची को सीने से भी नहीं लगा सकी. माहौल ग़मगीन पहले ही था कि अचानक किसी पुरानी हिंदी फिल्म में बाप का किरदार निभाने वाले नासीर खान जैसा गरीब बूढा कमरे में दाखिल हुआ और दुधमुन्हीं बच्ची को चूमते हुए सिसकते आदमी के सामने हाथ खोलकर खडा हो गया. कहीं से कुछ हज़ार रूपये मांगकर लाया था उसका बाप. 'बेटा, देर हो गयी क्या आने में मुझे?'

Sunday, August 16, 2009

इरशाद आजकल...!!!

बात शायद 1997 की सर्दियों की है. चंडीगढ़ में जनसत्ता अखबार के दफ्तर में चाय की चुस्कियों के दौरान जब इरशाद ने बताया कि वह बॉम्बे जा रहा है फिल्मों के लिए लिखने के लिए, तो मैंने मजाक में कहा-'हाँ जा यार, हम भी फिल्म इंडस्ट्री में किसी को जानने लगेंगे. फिर तेरे साथ फोटो खिंचाकर खुश होंगे. पर साले तू कहीं हमने पहचानने से भी इनकार मत कर देना'. इरशाद ने पुख्ता आवाज़ में कहा था-'तुझे ऐसा लगता है?' मैंने क्या कहा था ये तो मुझे ठीक से याद नहीं, लेकिन इरशाद ने यह कहा था तेरे नाम से बुलाकर मिलूँगा.
ऐसा हुआ भी. कल मुझे जब एक पुराने साथी का फोन आया कि इरशाद आया हुआ है चंडीगढ़. कल आ जाना एक फंक्शन में, वहीँ मिलेंगे. जब मैं वहाँ पहुंचा तब तक इरशाद पहुंचा नहीं था. हम लोग बाहर ही खड़े होकर उसका इंतज़ार करने लगे. एक घंटा लेट था इरशाद. हम बातें करने लगे की इन लोगों के साथ यह समस्या होती ही है, देर से आने की. खैर, इरशाद की गाडी दूर सड़क पर ही रुक गयी. उसमें से इरशाद और इम्तिआज़ निकले और पैदल चलते हुए आने लगे. हमें देखते ही इरशाद तेजी से आया और दूर से ही बोला-'और रवि, क्या हाल है?' इरशाद ने बारह साल पहले कही बात को सिद्ध कर दिया.
इसके बाद करीब एक घंटा साथ रहे और ढेर सी बातें की. बाकी दोस्तों के साथ-साथ मैंने भी कोशिश कि हम दोनों के बीच कहीं वह दीवार मिल जाए जिससे मैं महसूस कर सकूं की मेरे साथ बैठा इरशाद अब 'जब वी मेट' और 'लव आजकल' जैसी कामयाब फिल्मों का गीतकार इरशाद कामिल है और उसके साथ इन फिल्मों का डायरेक्टर इम्तिआज़ अली है. बहुत कोशिशों के बाद मुझे मानना ही पड़ा कि इरशाद आज भी कल वाला वही इरशाद है जिसके खाते से हम चाय मंगवा कर पीते रहते थे और बाद में इरशाद केन्टीन वाले कौशल के साथ हिसाब को लेकर बड़ी तमीज के साथ बहस करता था.
और इरशाद ने बड़ी साफ़गोई से यह भी बता दिया कि वह पहले भी यहाँ आता रहा है, लेकिन दोस्तों से मिलने का वक़्त नहीं निकाल पाया. हाँ, अपने घर मलेरकोटला जरूर गया. 'चमेली' और 'जब वी मेट' के बाद बाद भी और अब 'लव आजकल' की कामयाबी के बाद भी. और उससे मिलने के बाद मुझे लगा कि कुछ लोग कभी नहीं बदलते. कल भी वही थे, और आज भी. मैंने उससे पूछा यहाँ के दोस्तों को याद क्यों रखा हुआ है? तो इरशाद का जवाब था-जो गीत सुन रहे हो न, उनके लिए शब्दों के झोली यहीं से भरता हूँ.
खैर जाते जाते इरशाद ने मुझे यह भी बताया कि जनसत्ता अखबार से मिला कुल 327 रुपये का आखिरी चेक फ्रेम करवा कर रखा हुआ है. और मैंने भी उसे यह बता ही दिया कि केन्टीन वाले कौशल ने आज भी तुम्हारा 21 रूपये का हिसाब रखा हुआ है. (उसी चाय का बिल जो हम दोस्तों ने पी थी जब एक नाटक की कवरेज़ के लिए इरशाद टैगोर थिएटर गया हुआ था.)

Wednesday, June 24, 2009

मेरा दिल भी जिद पर अड़ा है किसी बच्चे की तरह...

मैं उसे अब तक कम ही जान पाया था, कल रात के बाद मुझे उसका एक अलग रूप नज़र आ रहा है। पता नहीं पिछले बारह साल तक मैंने उसमें एक जिद्दी बच्चे को क्यों नहीं देखा। हाँ, मैं राकेश की ही बात कर रहा हूँ। कल शाम ऑफिस से जल्दी काम निपटा लेने के बाद जब मैं उसके दफ्तर पहुंचा तो वह 'यूट्यूब' पर नूरजहाँ का गया 'लो फिर बसंत आया' ढूँढने में व्यस्त था। हालांकि उसने मुझे लम्बी सैर करने के लिए बुलाया था जो हम दोनों की बारह के पुरानी दोस्ती का एक सूत्र है.
उन दिनों जब हम में से किसी पर भी परिवार की जिम्मेदारी का अहसास हावी नहीं हुआ था और देर रात तक घर से बाहर रहने पर कोई जवाब नहीं देना होता था, तब राकेश और मैंने कई साल तक चंडीगढ़ में सुखना झील के किनारे-किनारे आधी रात बीते तक लम्बी सैर की हैं। मैं उन दिनों जनसत्ता अखबार में रिपोर्टर था और राकेश दिव्य हिमाचल नाम के अखबार में। मेरा दफ्तर उसके दफ्तर और घर के बीच में था. राकेश क्राईम रिपोर्टर था और डाक्टरी का ठप्पा लगा होने के कारण मैं 'हेल्थ कोरेस्पोंडेंट'. आधी रात को राकेश मेरे दफ्तर पहुंचता.मेरे दफ्तर की कनटीन में 'थाली' खा लेने के बाद हम दोनों अपने स्कूटरों पर लम्बी सैर को निकलते थे. झील पर जाकर स्कूटर एक कोने में फेंकते और झील के किनारे किनारे अँधेरे में गीत-गज़लें गाते-गुनगुनाते करीब पांच किलोमीटर की सैर करते. इस दौरान हम दिन भर की घटनाओं का जिक्र करते और भविष्य के लिए देखे जा रहे कुछ सपनों का भी. उनमें से एक कार खरीदने लायक पैसा जमा कर लेने का जिक्र रोज़ होता था. कई बार ऐसा भी होता था कि राकेश आते आते रास्ते में ही दारु का दौर पूरा करके आता था. ऐसे रोज़ राकेश की बातों में कुछ गुस्सा भी दिखता, लेकिन अगले ही पल वह खुद को रोक भी लेता. ऐसे ही पीने के बाद शुरू हुई चर्चा में एक अधकही सी कहानी भी शामिल हुई, जिसके बारे में तफसील देने से पहले ही सैर खत्म हो गयी.
उसके बाद राकेश की मित्र-मंडली में कुछ और रिपोर्टर शामिल हुए जो पीने-पिलाने के शौकीन थे. नहीं पीने वालों में होने के कारण हम दोनों के रोज़ मिलने के कारण कम होने लगे और सैर के बहाने भी. नौकरी करते करते कब दस साल बीते, पता ही नहीं चला.
पिछले कुछ महीनों से राकेश और मेरा सैर का बहाना फिर से बनने लगा तो मैंने पाया कि उसने कुछ जयादा ही पीनी शुरू कर दी थी. लगभग रोज़. और पिछले एक महीने से तो ऐसा होने लगा था कि सैर के बाद उसने मेरी कार में बैठकर पीने के लिए कहा. मेरे लिए वह कोका कोला की बड़ी बोतल लाता. अकेले पीने की उसकी इच्छा को पता नहीं क्यों मैं लगातार नोट करता आ रहा था. कल रात को सैर करने के बाद जब राकेश ने पीने के इच्छा जताई तो मैंने कार में बैठकर पीने की बजाय घर चलने को कहा. गर्मी से बचने के लिए पत्नी और बच्चा शिमला गए हुए हैं. ऐसे में राकेश भी मान गया. शायद घर के माहौल का असर ही था कि पीने के दौरान राकेश की सुई घर-परिवार की जिम्मेदारी पर आ टिकी. उसने कहा कि उसे लग रहा है पिछले दस साल का उसके पास कोई रिकार्ड नहीं है कि कैसे यह वक्त बीत गया था. घर परिवार की जिम्मेदारी ढोते. दिन रात घर परिवार की सुख-सुविधाओं के बारे में सोचते करते. इस दौरान खुद के लिए सोचने का भी वक्त नहीं मिला. और यह सब करने के दौरान ही उसे लगने लगा है कि खुद उसके लिए कुछ नहीं हो रहा. ऐसे में एक जिद्दी बच्चे की तरह उसने मुझसे कहा-'मैं क्यों सोचूँ किसी के लिए॥मैं तो पीयूँगा??'
(शायद हम सब में एक बच्चा छिपा बैठा है कहीं.)

Monday, June 22, 2009

किवें ऐ बाई हरमन सिद्धू....!!!

वैसे तो 23 साल किसी को भूल जाने के लिए कम नहीं होते. और ऐसे किसी इंसान को भूलने के लिए जिसे आप ठीक से जानते भी न हों. लेकिन पता नहीं क्यों हरमन सिद्धू के मामले में मेरे साथ ऐसा नहीं हुआ. हरमन को मैं कल पूरे 23 साल बाद मिला. हरमन और मैं पहली बार 10+1 में पहले दिन चंडीगढ़ के सरकारी कालेज में मिले थे. कितने दिन साथ साथ बैठे इसकी ठीक ठीक याद मुझे नहीं है, लेकिन पिछले हफ्ते नेट्वर्किंग साईट 'फेसबुक' में जब मैंने उसे देखा तो कालेज में पहले दिन की यादें ताजा हो गयी. याद आया कैसे छोटे से स्कूल से निकलकर पहले दिन इतने बड़े कालेज में जाना अपने ही शहर दिल अजनबी हो जाने का अहसास दे रहा था. पुराने दोस्तों में से किसी को ढूढती निगाहें इधर-उधर घूम रही थी. नोटिस बोर्ड पर क्लास का अता-पता लगाकर पहुंचा 'एलटी-1' यानी 'लेक्चर थिएटर-1'.
पहली बार सिनेमा हाल जैसी सीढियों जैसी क्लास में लम्बे-लम्बे बेंच पर बैठे मेरे जैसे नए लोग. आगे से तीसरी लाइन में बाएँ तरफ जाकर बैठ गया. सुबह आठ बजकर दस मिनट पर पहला लेक्चर था केमिस्ट्री का. लेक्चरर डाक्टर अत्तर सिंह अरोरा अभी तक पहुंचे नहीं थे. सीट पर बैठकर क्लास का जायजा लिया. बाएँ तरफ लड़कियां बैठी थी और अधिकतर लड़के दाईं तरफ बैठे थे. बाईं तरफ दीवार में एक बड़ी सी खिड़की खुलती थी जहाँ से बाहर एक छोटा सा मैदान था जिसके किनारे किनारे पीले रंग के फूल झूम रहे थे. बरसात का एक दौर सुबह ही गुजर चुका था.
इसके बाद मैं वापस क्लास में लौटा. मेरे साथ बाईं तरफ जो लड़का बैठा था उससे मैंने हाथ मिलाया. 'रविंदर', 'हरमन'!!! बस इतनी याद ही है मुझे उस दिन की और हरमन से पहली मुलाक़ात की. इसके बाद एक दिन और याद है जब कालेज की कैंटीन को बदल कर 'न्यू ब्लाक' के पास चली गयी थी और वहीँ एक दिन चाय लेने के लिए काउंटर की लाइन में खड़े हरमन का चेहरा मुझे याद है. उसके बाद वह साल और उसके अगला साल कहाँ गुजरा मुझे याद नहीं. बस यह याद है कि कालेज कि बिल्डिंग और क्रिकेट मैदान के बीच किनारे पर खड़े नीम्बू-पानी वाली रेहड़ी वाले के पास से गुजरने वाली कालेज की एकमात्र 'जींस वाली लड़की' को देखने के लिए हरमन मुझसे भी पहले पहुंचा होता था. हमारे कालेज हमारे एक ही लड़की थी उन दिनों जो जींस पहनने की हिम्मत करती थी. वैसे तो हमारा कालेज उन दिनों 'फार बायज' था लेकिन बी.काम कोर्स में लड़कियां भी थी. उन्हीं लड़कियों में से एक थी वो जींस वाली. उसका नाम हमें तो पता नहीं था लेकिन सीनियर्स से सुनकर पता चला था कि उसका नाम शायद किरन ढिल्लों था. सरदारनी थी. लम्बी और पतली सी. उसकी क्लास शायद दोपहर12:50 बजे ख़तम हो जाती थी और उस समय हमारा अंग्रेजी का पीरियड होता था. उसके के बाद बचता था एक पंजाबी का. सो, पंजाबी का लेक्चर 'बंक' करके हरमन मुझसे पहले नीम्बू-पानी की रेहड़ी पर पहुँचता..उसके पीछे पीछे मैं और अनुराग अबलाश.
किरन ढिल्लों दूर से ही न्यू ब्लाक से निकलती हुयी दिखती और धीरे धीरे से गेट से बाहर चली जाती. पीछे रह जाते हम. किरण ढिल्लों की जींस चर्चा का एक कारण यह भी था कि उन दिनों पंजाब में आतंकवाद की लहर चल रही थी. दो साल पहले ही '84' के दंगे होकर हटे थे. उसके चलते खाड़कू और सख्त हो गए थे और उन्होंने चंडीगढ़ समेत पूरे पंजाब में 'ड्रेस कोड' लागू कर दिया था जिसमें लड़कियों को सिर्फ सूट-सलवार पहनने और सर ढककर रखना भी शामिल था. ऐसे हालातों में किरन ढिल्लों का सरदारनी होकर जींस पहनना एक बड़ा साहसिक कदम था.
खैर, हरमन के बारे में फेसबुक पर पढ़ते ही मैंने उसे सन्देश भेजा और फिर मोबाईल नम्बर लिया और उससे मिलने जा पहुंचा. हरमन बदल गया था. पूरी तरह. मैंने उसे ऐसा देखने ही उम्मीद नहीं कि थी. सोचा था कि वह पहले की तरह उठकर गले मिलेगा और चंडीगढ़ के 'टिपिकल' तरीके से कहेगा 'किवें बाई जी'. पर ऐसा हुआ नहीं
हरमन 'व्हील चेयर' पर था. कोई 13 साल पहले एक कार दुर्घटना में उसकी रीढ़ की हड्डी में चोट लगी और शरीर के निचले हिस्से ने काम करना बंद कर दिया. पिछले 13 साल से हरमन व्हील चेयर पर है. लेकिन वह जो कर रहा है वह सभी नहीं कर सकते. हरमन 'अराईव सेफ' नाम की एक संस्था चला रहा है जो दुनियाभर परा सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए जागरूकता फैलाने का काम कर रही है. हरमन का नारा है 'अराईव सेफ' यानी सुरक्षित वापस घर पहुचें. हरमन इस दिशा में कई अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार ले चुका है. और अब देश की कई राज्य सरकारों के अफसरों को यह समझाने की कोशिश कर रहा है कि दुर्घटनाएं न सिर्फ वर्तमान और भविष्य को ख़त्म करती हैं, बल्कि यादों को भी ठेस पहुंचाती हैं...!!!
हरमन से मिलने के बाद मुझे याद आया कि किरन ढिल्लों को देखने के लिए मुझसे आगे भागता हुआ हरमन कितना सुंदर लगता था.